464 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
श्री श्यामनंदन सहाय : न केवल परिस्थिति विशेष में बल्कि सरकार की बदलती स्थितियों में भी। एक सरकार की एक सार्वजनिक नीति हो सकती है और कल किसी अन्य सरकार की दूसरी सार्वजनिक नीति।
डॉ. अम्बेडकर : ”सार्वजनिक नीति“ शब्द संविदा कानून में भी आता है।
उपाध्यक्ष महोदय : सम्पत्ति हस्तांतरण अधिनियम के अन्तर्गत कोई हस्तांतरण वैध नहीं होता, जो “सार्वजनिक नीति” के विरुद्ध हो।
श्री श्यामनंदन सहाय : ”एकसमान” शब्द के संबंध में पंडित ठाकुर दास भार्गव के संशोधन का मैं भी समर्थन करता हूँ। मेरी राय में ”प्रथा और रूढि़“ शब्दों से और कठिनाइयां आएँगी और आगे और मुकदमेबाजी भी होगी। यह भी जरूरी नहीं कि किसी नियम या व्यवहार का पालन किसी परिवार विशेष में एकसमान तरीके से किया जाता रहा हो और यदि माननीय कानून मंत्री को कोई आपत्ति नहीं हो तो मैं सर्वोच्च न्यायालय के एक मामले का उल्लेख करना चाहूँगा। मैं एक बहुत ही महत्वपूर्ण मामले का उल्लेख कर रहा हूँ जिसे मुगल बादशाहों के वंशज सर्वोच्च न्यायालय तक ले गए थे। अब मामला यह था कि मुगल बादशाहों के वंशजों में से भारत सरकार द्वारा दी जाने वाली पेंशन का पात्र कौन होना चाहिए और अनेक लोग अपना दावा ठोक रहे थे। एक कहता था कि मैं मुगल बादशाह का उत्तराधिकारी हूँ“ और दूसरा कहता था “मैं उत्तराधिकारी हूँ“। मामला सर्वोच्च न्यायालय तक गया और यह मुद्दा उठा कि उनमें से कौन खतनाशुदा है, क्योंकि उनमें से एक........
डॉ. अम्बेडकर : मैं इस मामले के बारे में जानता हूँ।
श्री श्यामनंदन सहाय : और सर्वोच्च न्यायालय ने इस विशेष मामले में निर्णय दिया था कि हालांकि मुस्लिम परिवारों में आम तौर पर खतने के नियम और प्रथा का पालन किया है, लेकिन मुगल बादशाहों के मामले में जब बच्चा हिन्दू पत्नी से होता था तो खतना जरूरी नहीं था और उन्हे पेंशन या उस तरह की किसी बात की पात्रता है। इसलिए माननीय विधि मंत्री जी इस बात से सहमत होंगे कि जहां तक किसी परिवार विशेष में प्रथाओं का संबंध है, एकरूपता कभी आवश्यक बात नहीं रही और मेरा विचार है कि वह पंडित ठाकुर दास भार्गव के इस संशोधन को स्वीकार करेंगे, जिसमें ”एकरूपता“ शब्द को हटा देने का सुझाव दिया गया है।
डॉ. अम्बेडकर : इसका कोई न्यायिक मूल्य नहीं है। प्रथा और दस्तूर के बीच भेद किया गया था। दस्तूर का कोई न्यायिक मूल्य नहीं होता है।
श्री नजीरुद्दीन अहमद : सबसे पहले तो मैं ”प्रथा“ शब्द की परिभाषा के बारे