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में कुछ कहना चहता हूँ और मैं यह भी कहना चाहता हूँ कि मैं सरकारी प्रारूप लेखक से पूर्णतः सहमत हूँ। श्री श्यामनंदन सहाय : एकबारगी।
श्री नजीरुद्दीन अहमद : माननीय मंत्री जी से मैं आमतौर पर सहमत रहता हूँ सिवाय उन मौकों के जब उनसे उचित बात नहीं कहलाई जाती। जहां तक इस “प्रथा” शब्द की पारिभाषा का संबंध है, केवल भारतीय कानून में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व के कानून में इसकी यही परिभाषा है। मेरे पास हॉलैण्ड के कानून की पुस्तक है और उसमें भी यही कहा गया है कि जिस प्रथा का अनुसरण किया जाना है उसे उचित होना चाहिए, निरंतर होना चाहिए, अटूट होना चाहिए और वह प्राचीन परंपरा होनी चाहिए। ये सभी बातें उसमें निर्धारित की गई हैं। न्यायशास्त्र में एकरूपता का प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण समझा जाता है। जब कोई प्रथा एक बार टूट जाती है तो उसमें निहित अनिवार्य विशेषताएं समाप्त हो जाती हैं। ऐसा हमेशा माना जाता रहा है। अतः इतना कहना कि प्रथा का अनुपालन खंडित हुआ है, उस प्रथा को तोड़ने के लिए पर्याप्त है। अतः मेरा विचार है कि परिभाषा जिस रूप में है, उसका समर्थन किया जाना चाहिए। जहां तक न्यायालयों के निर्णय का संबंध है, सभी मामलों में न्यायालयों के निर्णय इन्हीं आधारों पर विचार करने के बाद दिए जाते रहे हैं, अथवा दिए जाने चाहिए परन्तु ये जो आधार हैं, जो अत्यंत महत्वपूर्ण हैं और जो न्यायशास्त्र की पुस्तकों में पाए जाते हैं और इसीलिए न्यायालयों के निर्णयों पर निर्भर रहने के बजाए इन्हीं अनिवार्य विषयों पर निर्भर रहना कहीं ज्यादा बेहतर है क्योंकि न्यायालयों के निर्णय मामले विशेष की कठिनाईयों को ध्यान में रखकर दिए जाते हैं, इसलिए न्यायालयों के निर्णयों के मुकाबले सुविचारित एवं सुविख्यात अभिव्यक्तियों पर निर्भर रहना कहीं बेहतर होता है। इसलिए मेरा विचार है कि इस विधेयक की परिभाषा वही रखी जानी चाहिए। 11.00 बजे पूर्वाह्न
श्री जे. आर. कपूर : अपने माननीय मित्र पंडित ठाकुर दास भार्गव के विचारों को देखते हुए मैं उनके द्वारा प्रस्तुत दो संशोधनों की जरूरत को समझ नहीं पाया हूँ। जहां तक मैं समझ पाया हूँ उनका विचार है कि ”प्रथा“ की परिभाषा प्रतिबंधित स्वरूप की होनी चाहिए और देश के विभिन्न भागों में विभिन्न प्रकार के और विभिन्न प्रथाओं को माना नहीं जाना चाहिए। यह उनका विचार है और इससे मैं पूरी तरह सहमत हूँ, मेरा विचार है कि यदि पंडित ठाकुर दास भार्गव द्वारा सुझाए गए संशोधन स्वीकार कर लिए जाते हैं तो ”प्रथा“ शब्द का दायरा, वाच्यार्थ बहुत व्यापक और विस्तृत हो जाएगा, जो नहीं होना चाहिए। इस विधेयक की एक उपयोगी बात यह