466 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
है कि यह हिंदू समाज को किसी न किसी रूप में एकजुट करने और जोड़ने जा रहा है और इसीलिए तौर-तरीकों और प्रथाओं में और हिंदू समाज पर लागू नियमों में जितने कम बदलाव किए जाएं उतना ही बेहतर है। इस कोड का मूल आधार एकरूपता है जो यह समाज में भी लाएगा और उस आधार स्तम्भ से दूर नहीं जाना चाहिए और इस विधेयक के प्रत्येक खंड पर विचार करते समय हमें इस तथ्य से अपना ध्यान कभी नहीं हटाना चाहिए। एक बार हमारा ध्यान हटने पर हम इस नए कानून का आधार ही खो देंगे। पंडित ठाकुर दास भार्गव का सुझाव क्या है?
सबसे पहला उनका सुझाव है कि “एकरूपता” शब्द को हटा दिया जाना चाहिए। इसका अभिप्राय यह होगा कि यदि किसी प्रथा के अनुपालन में एकरूपता नहीं भी रही हो तब भी वह इस परिभाषा के अन्तर्गत एक प्रथा होनी चाहिए। दूसरा उनका सुझाव है कि ”सार्वजनिक नीति के विरूद्ध“ शब्द हटा दिए जाने चाहिएं। इसका फिर अभिप्राय है कि कोई प्रथा चाहे वह सार्वजनिक नीति के विरुद्ध है, किसी के अनुसार उसे प्रथा के रूप में स्वीकृत होना चाहिए, जैसा कि यहाँ परिभाषित है। इससे फिर हम प्रथा का दायरा बढ़ा रहे हैं, न कि उसे सीमित कर रहे हैं। मेरा निवेदन है कि इन सुझावों को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। मेरे विचार से यह प्रतीत होता है कि ”सार्वजनिक नीति के विरूद्ध“ शब्द अत्यंत आवश्यक और अनिवार्य हैं। क्योंकि हमारा समाज या कोई भी समाज निरंतर प्रगतिशील समाज है और नैतिकता, मर्यादा और किसी बात की अनुकूलता से संबंधित प्रतिमान समय-समय पर बदलते रहते हैं। इस वांछित परिवर्तन पर हमें पूर्ण विराम नहीं लगाना चाहिए। एक प्रथा, जिसे न्यायिक दृष्टि से किसी समय मान्यता प्राप्त रही हो, यह हो सकता है कि 10 या 20 वर्ष बाद समाज को उचित अथवा वांछनीय प्रतीत न होती हो। उस समय समाज को और यहां तक कि न्यायालयों को भी यह घोषणा करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए कि यह प्रथा चाहे इसे न्यायालयों के निर्णयों में मान्यता प्राप्त रही हो, समाज की बदलती स्थितियों और समाज द्वारा अपनाए गए आर्थिक और सामाजिक सिद्धांतों के अनुसार अब वैध प्रथा के रूप में इसकी मान्यता नहीं है। इसलिए मेरा निवेदन है कि यह भाग, जिस रूप में है, उसे स्वीकार कर लिया जाना चाहिए।
मेरा निवेदन है कि मेरे माननीय मित्र श्री झुनझुनवाला द्वारा प्रस्तुत संशोधन स्वीकार कर लिया जाए, क्योंकि इसमें कोई नुकसान नहीं है महोदय, मैं निवेदन करना चाहता हूँ कि इस चरण में, यदि माननीय विधि मंत्री जी इसे विलम्ब न समझते हों तो मूल खंड से “अथवा परिवार” शब्द हटा दिए जाएं। क्योंकि मुझे प्रतीत होता है कि........
उपाध्यक्ष महोदय : संशोधन कहाँ है?
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