हिंदू कोड-जारी - Page 483

468 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

वे कहते हैं कि केवल जिन प्रथाओं के संबंध में न्यायालय द्वारा निर्णय दिए गए हैं, उन्हें ही स्वीकार किया जाना चाहिए। यह भी गलत है। न्यायालयों के कुछेक निर्णय हैं जो अब अच्छे कानून नहीं हैं क्योंकि जनमत अब बदल चुका है। लोग अब उस प्रथा को रखना नहीं चाहते हैं। कुछेक प्रथाएं हैं जो अत्यंत मान्यता प्राप्त हैं परन्तु जो कभी अदालतों तक नहीं पहुंचीं और उनके बारे में कोई अदालती निर्णय नहीं है। इसलिए मेरा निवेदन है कि पंडित ठाकुर दास भार्गव के संशोधन कहीं भी स्वीकार्यता की स्थिति में नहीं हैं। श्री झुनझुनवाला अपने संशोधन में “वर्ण” शब्द जोड़ना चाहते हैं। ऐसी कोई प्रथा नहीं है जो किसी वर्ण से जुड़ी हो। सभी प्रथाएं जातियों, परिवारों, कतिपय क्षेत्रों से जुड़ी होती हैं मैं ऐसी किसी प्रथा या किसी न्यायालय के निर्णय के बारे में नहीं जानता जिसमें किसी प्रथा को किसी वर्ण की प्रथा बताया गया हो। ऐसा मामला कभी किसी न्यायालय के सामने नहीं आया है जहां तक श्री श्यामनंदन सहाय के संशोधन का संबंध है वे चाहते हैं कि दो परंतुक हटा दिए जाएं। ये परन्तुक उस पूरी परिभाषा की जान और रूह हैं। अतः उन्हें हटाया नहीं जा सकता है। अतः महोदय, खंड ( i ) जिस रूप में है मैं उसका समर्थन करता हूँ।

श्री बी.के. पी सिन्हा : मुझे लगता है कि इस खंड में प्रस्तावित संशोधनों में

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कोई दम नहीं है। यह खंड जिस प्रकार माननीय विधि मंत्री जी ने प्रस्तुत किया है, अत्यंत सरल है और कानून इसमें निहित है। आलोचकों ने ”एक समान रूप से“ और “सार्वजनिक नीति” शब्दों पर आपत्ति की है। परन्तु विभिन्न उच्च न्यायालयों के कई निर्णयों में यह निर्धारित किया गया है कि किसी प्रथा के वैध होने के लिए उसका पालन एक समान रूप से किया जाना चाहिए श्री श्यामनंदन सहाय ने इसके समर्थन में प्रिवी कौंसिल के किसी मामले का हवाला दिया था। उनका तर्क था कि एकरूपता किसी वैध प्रथा का अनिवार्य तत्व नहीं है। मैं उन्हें समझ नहीं पाया इसलिए जो मैं कह रहा हूँ उसमें कोई त्रुटि हो तो सुधार दिया जाए। सामाजिक और धार्मिक प्रथाआेंं तथा कृषि और व्यापार के क्षेत्र में प्रचलित प्रथाओं के बीच अन्तर है। जहां तक समाज और धर्म का संबंध है, प्रथा और लोक व्यवहार दरअसल परस्पर परिवर्तनीय शब्द है और दोनों के बीच महीन अंतर है। लेकिन व्यापार और कृषि के मामले में प्रथा और लोकाचार के बीच भेद किया गया है। प्रथा अपनी प्राचीनता से जानी जाती है; यह अनादि काल से चली आ रही होनी चाहिए। लोकाचार प्रगति की प्रक्रिया में होता है। यह नयापन लिए होता है। प्रिवी कौंसिल के जिस मामले के बारे में मैं जानता हूँ उसमें केवल व्यापार और कृषि के संबंध में भेद किया गया है लेकिन वह इस प्रश्न से सम्बद्ध या प्रासंगिक नहीं है, जो एक सामाजिक और अर्द्ध-धार्मिक प्रश्न है। कई निर्णयों में मैंने देखा है कि एकरूपता को किसी प्रथा की वैधता के परीक्षण के रूप में