हिंदू कोड-जारी - Page 484

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निर्धारित किया गया है। जहां तक सार्वजनिक नीति का संबंध है मैं नहीं जानता कि लोग इसके आधार पर इतने डरे हुए क्यों हैं, क्योंकि मैं जानता हूँ कि प्रिवी कौंसिल, पटना, कलकत्ता और कई उच्च न्यायालयों ने यह निर्धारित किया है कि कोई भी प्रथा जो सार्वजनिक नीति के विरुद्ध है, वैध नहीं होगी। मैंने देखा है कि इस संबंध में भी माननीय विधि मंत्री जी ने इस खंड में कानून को यथारूप निहित रखा है। इसके अलावा यदि हम सभी प्रकार की प्रथाओं के बारे में छूट देते चलें तो इसे संहिताबद्ध करने का आधार और औचित्य क्या होगा। संहिताबद्ध करने का आधार एकरूपता और निश्चितता लाना है यदि हम विभिन्न परिवारों, विभिन्न भू-भागों आदि में प्रचलित प्रथाओं के लिए छूट का प्रावधान कर दें तो पूरे देश के लिए कोई एकसमान कानून नहीं होगा और संहिताबद्ध करने का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा। संहिताबद्ध करने का दूसरा उद्देश्य यह है कि हर किसी के संदर्भ के लिए निश्चित रूप से कुछ होगा। यदि हम प्रथाओं आदि के लिए छूट का प्रावधान कर देते हैं तो यह निश्चितता गायब हो जाएगी। इसलिए किसी भी दृष्टि से मुझे इस खंड को यथारूप पारित न करने और किसी संशोधन को स्वीकार करने का कोई कारण दिखाई नहीं देता।

उपाध्यक्ष महोदय : अब मैं माननीय विधि मंत्री जी को आमंत्रित करूंगा।

बाबू रामनारायण सिंह (बिहार) : महोदय, मैं कुछ कहना चाहता हूँ।

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उपाध्यक्ष महोदय : क्या पहले ही पर्याप्त रूप से कुछ कहा नहीं गया है?

* श्री भट्ट : (हिन्दी भाषण का अंग्रेजी में अनुवाद) मेरा एक संशोधन है।

उपाध्यक्ष महोदय : आपका संशोधन कौन सा है? मैंने इसकी अनुमति नहीं दी है।

श्री भट्ट : आपने अनुमति दी है।

उपाध्यक्ष महोदय : लेकिन इसमें विशेष कुछ भी नहीं है। इसमें केवल शब्दों में फेरबदल किया गया है।

श्री भट्ट : यही मैं स्पष्ट करना चाहूँगा कि इसे मैंने ऐसा क्यों बनाया है। मैं केवल शब्दों के फेरबदल के लिए प्रस्तुत नहीं कर रहा हूँ।

बाबू रामनारायण सिंह : मैं बहुत देर से खड़ा हूँ।

उपाध्यक्ष महोदय : तो मुझे क्या करना चाहिए?

श्री वी. जे. गुप्ता (मद्रास) : महोदय, मैं कोई भाषण नहीं देना चाहता, मैं केवल एक संदेह दूर करना चाहता हूँ।

* संसदीय वाद-विवाद, खंड XV भाग II, 20 सितंबर, 1951, पृष्ठ 3014-54