हिंदू कोड-जारी - Page 485

470 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

बाबू रामनारायण सिंह : आपकी नजर मुझ पर पड़नी चाहिए थी।

उपाध्यक्ष महोदय : यदि कोई माननीय सदस्य कई बार उठ कर खड़ा होता है, तो यह जरूरी नहीं कि मेरा ध्यान उसकी ओर जाए। बहस को नियंत्रित करने का मेरा विवेकाधिकार है और मैं कुछ सदस्यों को बुला सकता हूँ तो कुछ को नहीं। लेकिन यदि समय बचा, तो हम देखेंगे।

डॉ. अम्बेडकर : केवल एक मुद्दा स्पष्ट किया जाना है और....

श्री भट्ट : आपने मुझे समय दे दिया है।

उपाध्यक्ष महोदय : ठीक है। मैं कानून मंत्री जी को बाद में बुलाऊँगा। लेकिन इस संशोधन में जिस बात पर चर्चा हो रही है वह बहुत ही औपचारिक और मौखिक मामला है।

बाबू रामनारायण सिंह : जी, नहीं, यह महत्वपूर्ण भी है।

श्री भट्ट : मेरा प्रस्तावित किया गया संशोधन मौखिक नहीं है। इसमें जिस बात पर मैं जोर देना चाहता हूँ वह शायद माननीय कानून मंत्री जी को स्वीकार्य न हो और शायद वे अपना दृष्टिकोण बदलने के लिए तैयार न हों। दरअसल उनके वकील होने के नाते उनसे कुछ मनवा लेने की क्षमता मुझमें नहीं है, परन्तु जो उपाय उन्हांने प्रस्तावित किया है, उसमें जिन बातों का अभाव है वह मैं उन्हें बताना और उनका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ।

पहला मुद्दा ”प्रथा और रूढि़” से हमारा अभिप्राय परम्पराओं, परिपाटियों और रोजमर्रा के व्यवहार से है। उनके द्वारा इसके लिए प्रतिपादित परिभाषा चार अनिवार्य विशेषताओं तक सीमित है अर्थात् निरंतरता, एकरूपता, निश्चितता और इनका सार्वजनिक नीति के विरुद्ध नहीं होना। इसके स्थान पर मैं एक आसान परिभाषा पर विचार कर रहा हूँ जो ठीक वही अर्थ ध्वनित करे। लेकिन उन्हांने एकरूपता की बात कही थी। यह एकरूपता क्या होती है? विभिन्न जातियों की अपनी अलग-अलग प्रथाएं होती हैं। यहां तक कि एक ही जाति में जो लगभग हजार गांवों में फैली है, उसके अलग-अलग इलाकों में विभिन्न प्रकार के रूढि़यों में कई प्रकार की रियायतें होती हैं और इसलिए एक जाति में भी अलग-अलग स्थानों पर अलग किस्म की एकरूपता होती है। अन्तर भी होते हैं। इसलिए एकरूपता शब्द से बहुत ज्यादा मुकदमेबाजी होगी और वकील लाभान्वित होंगे। इसलिए इसे छोड़ दिया जाना चाहिए क्योंकि अन्तर अवश्यंभावी है।

यदि कोई समुदाय किसी नियम के विरुद्ध जाता है, तो जो उसकी रूढि़ है,