472 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
“इसे निरंतर, शांतिमय, पर्याप्ततः निश्चित, अनिवार्य होना चहिए और प्रत्येक व्यक्ति की इच्छा पर नहीं छोड़ा जाना चाहिए कि वह इसका प्रयोग करेगा अथवा नहीं करेगा, और अन्य प्रथाओं से सुसंगत होना चाहिए क्योंकि एक प्रथा को दूसरी के विरुद्ध नहीं कहा जा सकता है।”
इन सब बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए। मैंने सुझाव दिया था कि ”निरंतर” शब्द प्रचलन में होने के समतुल्य है। यह कोई गलत शब्द नहीं है, ”प्रचलन में” अंग्रेजी भाषा का एक परिपूर्ण शब्द है जिससे कोई बात जो प्रचलित या चलन में है, अभिप्रेत है। इसीलिए मैंने ”जो लम्बे समय से प्रचलन में हो”, ”जिसका लम्बे समय से अनुसरण किया जा रहा हो” प्रस्तावित किया है।
दूसरी बात जो मैंने प्रस्तुत की है वह है :
”जिसे विधि का बल प्राप्त है”। यह एक साधारण बात है और यदि स्वीकार कर ली जाए तो एक मान्य परिपाटी बन जाएगी।
तीसरी बात जो मैंने ली है वह ”सार्वजनिक नीति” या ”सार्वजनिक नैतिकता” के बारे में है। मेरी समझ में नहीं आता कि यदि प्रस्तावित कानून में परिपाटियां भी शामिल कर ली जाती हैं तो ‘सार्वजनिक नीति’ शब्द की आवश्यकता कहाँ है? आप कह सकते हैं कि केवल स्वीकृत परिपाटियाँ ही शामिल की जाएंगी अन्य नहीं तो कौन सी परिपाटी सार्वजनिक नीति के खिलाफ है? ‘सार्वजनिक नीति’ का अर्थ क्या है? हो सकता है कि यह शब्द वकील या जज द्वारा हटा दिया गया हो और अब हम प्रयोग कर रहे हैं परन्तु ”सार्वजनिक नीति” का आशय हमें स्पष्ट होना चाहिए। मेरे विचार से ”सार्वजनिक नीति” या सार्वजनिक नैतिकता” जैसी अभिव्यक्तियों की कोई आवश्यकता नहीं है। दरअसल जहां कानून में परिपाटियों को स्थान दिया जाएगा, वहां परिपाटियों का अनुसरण भी किया जाएगा। इसीलिए मैं इन शब्दों की कोई जरूरत नहीं समझता हूँ।
अब मैं जाति और उपजाति के बारे में कुछ कहना चाहता हूँ। ये शब्द मेरे अपने नहीं हैं बल्कि इनका प्रयोग हमारे संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में किया गया है। कल हमने खंड 2 में “सम्प्रदाय“ शब्द का प्रयोग किया था। संविधान में हमने “सम्प्रदाय” शब्द नहीं बल्कि जाति शब्द का प्रयोग किया है। मेरी राय में यहां “सम्प्रदाय” शब्द के स्थान पर ”जातियाँ“ और उपजातियाँ“ शब्द अधिक उपयुक्त होंगे। मेरा अभिप्राय यह नहीं कि “सम्प्रदाय” शब्द हटा दिया जाए, क्योंकि हमने इसे कल ही शामिल किया है, परन्तु ये दो शब्द भी जोड़ दिए जाएं तो कोई नुकसान नहीं है।
इन शब्दों के साथ मैं अपना संशोधन प्रस्तुत करता हूँ। इसे पारित किए जाने की संभावना कम ही है लेकिन माननीय विधि मंत्री जी इस पर विचार करें।