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बाबू नारायण सिंह : महोदय, मेरा कहना है कि आपके द्वारा लिया गया निर्णय उचित है और सबको स्वीकार्य है। लेकिन कभी-कभी आप निर्णय इतनी जल्दबाजी में लेते हैं कि यह बात हमें कचोटती है। इसलिए मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि इस आधार पर आप जल्दबाजी में कोई निर्णय न लें कि इस कानून पर पर्याप्त बहस की जा चुकी है। मेरा निवेदन है कि मैं कई बार खड़ा हुआ था और आपका ध्यान मेरी ओर जाना चाहिए था और मुझे अपनी बात कहने की अनुमति दी जानी चाहिए थी।
श्री वी. जे. गुप्ता : मुझे एक संदेह है जिसे मैं दूर कर लेना चाहता हूँ। परिभाषा में कहा गया है कि :
”प्रथा“ और “लोकाचार” अभिव्यक्तियां एक नियम दर्शाता है जिनका पालन लम्बे समय तक निरंतर और एक समान तरीके से किए जाने के कारण इन्हांने किसी स्थानीय क्षेत्र, जनजाति, सम्प्रदाय, समूह अथवा परिवार के हिंदू लोगों में कानून का बल प्राप्त कर लिया है।”
जैसा कि आप जानते हैं, हमारे इलाके में कुछेक समुदायों में किसी लड़के और उसकी ममेरी बहन के विवाह की अनुमति है। यह एक सामान्य प्रथा है, हालांकि समान रूप से और हर मामले में ऐसा नहीं किया जाता है।
उपाध्यक्ष महोदय : आपको पूरा अध्याय पढ़ना चाहिए। उसमें विशेष प्रावधान किया गया है।
श्री वी. जे. गुप्ता : आगे कहा गया है ‘‘सार्वजनिक नीति के विरुद्ध’’ कोई पद्धति “प्रथा” तब कहलाती है जब किसी क्षेत्र के सभी लोग उसका पालन करते हैं। जब इसका अनुसरण सभी लोग एक समान रूप से करते हैं तो यह सार्वजनिक नीति के विरुद्ध कैसे हो सकती है?
डॉ. देशमुख : मैं इसका विरोध करना चाहता हूँ।
उपाध्यक्ष महोदय : आप इसके विरुद्ध मतदान कर सकते हैं।
बाबू रामनारायण सिंह : हम इस पर बोलना भी चाहेंगे।
उपाध्यक्ष महोदय : मुझे मालूम है कि माननीय सदस्यों को अपनी बात कहने का अधिकार है, लेकिन मैंने देख लिया है और मैं संतुष्ट हूँ कि इस पर पर्याप्त बहस की जा चुकी है। यदि माननीय सदस्य चाहते हैं कि प्रश्न रखने की औपचारिकता निभाई जाए तो कोई प्रस्ताव करे और मैं इसे सदन के समक्ष रखूँगा।