हिंदू कोड-जारी - Page 489

474 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

श्री संथानम : महोदय, अब प्रश्न रखा जाए।

उपाध्यक्ष महोदय : प्रश्न इस प्रकार है :

कि प्रश्न अब रखा जाए।

प्रस्ताव स्वीकार किया गया।

बाबू रामनारायण सिंह : मेरी आवाज उनकी आवाज से तेज थी।

डॉ. अम्बेडकर : अपने पिछले वक्तव्य में मैंने खंड 4 के संबंध में इस उप-खंड की स्थिति और इस कोड को देखते हुए प्रथा का प्रश्न कैसे उठाया गया है, इन दोनों बातों को स्पष्ट कर दिया था।

जहां तक वास्तविक शब्द का संबंध है, जिसे ”प्रथा“ शब्द की परिभाषा में प्रयुक्त किया गया है, मैं माफी चाहता हूँ कि सुझाए गए संशोधनों में से कोई भी संशोधन स्वीकार करना मेरे लिए संभव नहीं है। जैसा कि मैंने कहा, यह परिभाषा हमारे देश के और अन्य देशों के सर्वोच्च अधिकरणों के न्यायिक निर्णयों से शब्दशः नकल की गई है, जिनमें प्रथा शब्द की न्यायिक परिभाषा दी गई है। इसलिए मुझे नहीं लगता है कि उप-खंड में प्रस्तावित परिभाषा को बदलने के लिए मेरे लिए कोई आधार बनाया गया है।

उपाध्यक्ष महोदय : प्रश्न इस प्रकार है :

खंड 3 में “जब तक विषय अथवा संदर्भ से अन्यथा प्रतिकूल न हो” शब्दों के स्थान पर ”जब तक सन्दर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो“ शब्द रखे जाएं।

प्रस्ताव स्वीकार किया गया।

उपाध्यक्ष महोदय : प्रश्न इस प्रकार है :

खंड 3 में मौजूदा मद ( i ), ( ii ), ( iii ) और ( iv ) का पुनः संख्यांकन ( ii ), ( iii ), ( iv ) और ( v ) के रूप में किया जाए और निम्नलिखित को मद सं. ( i )े के रूप में अंतःस्थापित किया जाए, अर्थात् :

“( i ) “आलियासंतान कानून” से उन लोगों पर लागू कानूनी प्रणाली अभिप्रेत है,जो मद्रास आलियासंतान अधिनियम, 1949 (1949 का मद्रास अधिनियम IX ) से शासित होते, यदि यह कोड पास नहीं हुआ होता।”

प्रस्ताव स्वीकार किया गया।

उपाध्यक्ष महोदय : पिछले संशोधन में स्वीकार भागों के पुनः संख्यांकन के कारण