हिंदू कोड-जारी - Page 497

482 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

के संबंध में अनेक प्रथाएं हैं। दत्तक ग्रहण और किसी उत्तराधिकारी के बीच कोई अन्तर नहीं होता है। कभी-कभी तो रस्में भी एक समान ही होती हैं। जिस व्यक्ति को उत्तराधिकारी नियुक्त किया जाता है उसके साथ लगभग पुत्रवत् व्यवहार किया जाता है। वह नियुक्ति करने वाले की पुत्री के साथ विवाह नहीं कर सकता, क्योंकि नियुक्ति करने वाले की पुत्री उसकी बहन होती है। पंजाब में कोई व्यक्ति इस बात पर विश्वास नहीं करेगा कि नियुति करने वाले पिता की पुत्री का विवाह उस लड़के के साथ संभव है। वह चचेरी बहन से भी विवाह नहीं कर सकता है। उससे तो पुत्रवत् व्यवहार किया जाता है। अन्तर केवल इतना ही है कि जहां तक उत्तराधिकारी की पात्रता का संबंध है, वह बाल-बच्चों वाला विवाहित व्यक्ति भी हो सकता है।

श्री राजगोपालाचारी : इस मामले में माननीय सदस्य शायद हमें कुछ और बताएंगे - क्या उस प्रथा के अनुसार अपने स्वयं के दामाद को पुत्र बनाने की स्वतंत्रता है?

पंडित ठाकुर दास भार्गव : तब उसे “घर जंवाई” कहा जाता है।

उपाध्यक्ष महोदय : इसी प्रकार की एक प्रथा दक्षिण भारत में भी है -इसे ’इल्लाटोम दत्तक ग्रहण’ कहा जाता है।

पंडित ठाकुर दास भार्गव : यह प्रथा न केवल न्यायिक दृष्टि से मान्यता प्राप्त है, बल्कि व्यापक रूप से मान्य है और तकरीबन एक कानून है। यह एक पूर्ण रूप से स्थापित प्रथा है और इस देश के सामान्य कानून से कहीं अधिक बल इसमें है। यह हिंदूओं, सिखों और मुसलमानों में सार्वभौमिक रूप से मान्य है। इस तरह से निर्मित संबंध महज तोहफा नहीं और महज एक उत्तराधिकारी नियुक्त करना नहीं है। यह संबंध व्यक्तिगत होता है; नियुक्त उत्तराधिकारी के साथ पुत्र के समान व्यवहार किया जाता है और वह पिता के साथ रहता है....

डॉ. अम्बेडकर : सम्पत्ति के प्रयोजनार्थ।

पंडित ठाकुर दास भार्गव : सम्पत्ति के लिए और आत्मीय संबंध के लिए भी। बाहर के किसी व्यक्ति की तरह वह पुत्री के साथ ब्याह नहीं कर सकता है। इसलिए यह सवाल महज सम्पत्ति का नहीं है; यह प्रश्न आत्मीय संबंध का है।

उपाध्यक्ष महोदय : क्या पुत्र, पिता से आयु में बड़ा हो सकता है?

पंडित ठाकुर दास भार्गव : वह बड़ा हो सकता है; ठीक वैसे ही जैसे भतीजा दत्तक ग्रहण करने वाले व्यक्ति से आयु में बड़ा हो सकता है। भाई का पुत्र, नियुक्ति करने वाले व्यक्ति से आयु में बड़ा हो सकता है।