हिंदू कोड-जारी - Page 499

484 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

पंडित ठाकुर दास भार्गव : लेकिन वह पुत्र तो नहीं बन सकती।

डॉ अम्बेडकर : इस बात को देखते हुए कि इस विधेयक को विवाह और विवाह विच्छेद तक सीमित रखने का निर्णय लिया गया है। मेरे माननीय मित्र ने जो मुद्दा उठाया है उस पर हम दत्तक ग्रहण का मामला आने पर विचार कर सकते हैं। वहां हम इस प्रश्न पर विचार-विमर्श कर सकते हैं कि क्या दत्तक पुत्र की परिभाषा में हम कथित नियुक्त पुत्र को शामिल कर सकते हैं। वहां पर, हमने अभी जिस परिभाषा को पारित किया है उसे ध्यान में रखते हुए हम उस प्रश्न पर विचार करेंगे। यदि वह हमें संतुष्ट कर देते हैं कि यह प्रथा ऐसी प्रथा है जिसे सदन द्वारा अनुमत किया जाना चाहिए। यहां पर अभी भी हम विवाह और विवाह-विच्छेद पर चर्चा कर रहे हैं।

पंडित ठाकुर दास भार्गव : लेकिन आपने यहां “पुत्र” शब्द का प्रयोग किया है; अन्यथा किसी परिभाषा की जरूरत नहीं होगी।

डॉ. अम्बेडकर : जैसा कि आप जानते हैं दत्तक ग्रहण से संबंधित अध्याय में हमने एक समान पद्धति लागू करने का प्रयास किया है और हम दत्तक ग्रहण की किस्मों में से किसी को भी मान्यता नहीं दे रहे हैं। हमारा कहना है कि दत्तक ग्रहण की सब जगह एक सामान्य प्रणाली होनी चाहिए। हमने उसमें यह भी कहा है कि जहां तक दत्तक ग्रहण से जुड़ी रस्मों का संबंध है, वे अलग-अलग हो सकती हैं। हमारा इससे कोई लेना-देना नहीं है। यदि दत्तक ग्रहण की परिभाषा की दृष्टि से पुत्र की नियुक्ति सन्तोषजनक है। उदाहरणार्थ लेना और देना, लडके के मुंह में शक्कर डालना, तो जिन रस्मों के द्वारा यह सब किया जाता है, तो उनसे नियुक्त पुत्र दत्तक पुत्र नहीं बन जाएगा।

पंडित ठाकुर दास भार्गव : बदकिस्मती से मैं अपनी बात उस तरह व्यक्त नहीं कर पाया हूँ जिससे डॉ अम्बेडकर को संतुष्ट कर सकूँ।

उपाध्य महोदय : पंडित भार्गव द्वारा उठाया गया मुद्दा विवाह के संदर्भ में भी उपयुक्त है।

डॉ. अम्बेडकर : माफ कीजिएगा, किसी प्रथा को ठीक तरह से समझे बिना परिस्थितियों, प्रथा, उसकी उपयुक्तता अथवा अनुपयुक्तता को जाने बिना-मैं कोई निर्णय करने में सक्षम नहीं हूँ। न ही मेरे मित्र कोई साफ तस्वीर पेश कर सके हैं। मैं उस विषय पर अपना दिमाग लगाना चाहता हूँ और यह निर्णय करना चाहता हूँ कि क्या सरकार के लिए यह प्रस्ताव स्वीकार करना संभव होगा। यह एकाएक संभव नहीं है।