हिंदू कोड-जारी - Page 500

485 12 बजे मध्याह्न

पंडित ठाकुर दास भार्गव : इसे हम यथावत् रहने दें।

डॉ. अम्बेडकर : इसे हम बाद में जोड़ सकते हैं।

उपाध्यक्ष महोदय : मैं एक तरीका बता सकता हूँ। वैसे तो इसे पारित करने पर कोई आपिŸा नहीं है। प्रयास केवल किसी और वर्ग को इसमें शामिल करने का है। इसलिए अभी इसे पारित किया जा सकता है, क्योंकि पूरा खंड 3 अभी पारित नहीं कर रहे हैं। बाद में हम इसमें एक और वर्ग को जोड़ सकते हैं। यदि यह मान्य हो तो मैं सदन में इस भाग पर मतदान कराऊंगा।

प्रश्न इस प्रकार है :

“कि खंड 3 का भाग ( viii ), जिसकी क्रम संख्या को बदलकर भाग ( xi ) किया गया है, इस विधेयक का भाग बना रहेगा।“

प्रस्ताव स्वीकार किया गया।

उपाध्यक्ष महोदय : अब हम खंड 4 पर जाएंगे।

कैप्टन ए. पी. सिंह : मैंने आपसे पहले ही अनुरोध किया है कि भाग ( viii ) के बाद एक परिभाषा जोड़ी जानी चाहिए। यह संशोधन सं. 378 है और ’कुल’ की परिभाषा के बारे में है। कुछ माननीय सदस्यों को आश्चर्य हो सकता है कि मैं ऐसा क्यों चाहता हूँ कि इस शब्द को परिभाषित किया जाना चाहिए। परन्तु यदि आप संशोधन सं 387 को देखें तो उसमें मैंने कहा है कि ”पक्षकार समान ’कुल’ के नहीं होने चाहिए जहां कोई प्रथा ऐसा विवाह निषिद्ध करती है।“ मैं चाहता हूँ कि इस शब्द को यहां परिभाषित किया जाना चाहिए, ताकि एक ही कुल के भीतर विवाह न हो सके।

डॉ. अम्बेडकर : मैं स्थिति स्पष्ट करने की अनुमति चाहता हूँ। दरअसल, यह संशोधन यद्यपि एक परिभाषा के रूप में हैं, तथापि वास्तव में यह खंड 7 - वैध धार्मिक विवाह की अनिवार्य बातें - से संबंधित है, जिसमें एक वैध धार्मिक विवाह के लिए कुछ शर्तें निर्धारित की गई हैं। मेरे माननीय मित्र स्वतंत्र रूप से एक और शर्त जोड़ना चाहते हैं कि किसी विवाह के पक्षकार समान कुल से संबंधित नहीं होने चाहिए। यदि वह संशोधन स्वीकार कर लिया जाता है तभी ’कुल’ की परिभाषा देने की आवश्यकता होगी। हालांकि यह कहा जा सकता है कि ’कुल’ एक इतना जाना पहचाना शब्द है कि इसके लिए किसी परिभाषा की आवश्यकता नहीं है। लेकिन जब