486 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
हम खंड 7 पर चर्चा कर रहे हों और यह मामला उठाया जाता है और यह सदन संशोधन को स्वीकार कर लेता है, तो ’कुल’ की परिभाषा हम उसी समय शामिल कर सकते हैं। इसलिए ’कुल’ को परिभाषित करने कि अभी कोई आवश्यकता नहीं है।
कैप्टन ए. पी. सिंह : मेरी कठिनाई इस प्रकार है जब कभी ऐसी कोई बात सामने आती है, तब सामान्यतः यह कहा जाता है कि “इस शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है“। इसलिए मैं चाहता था कि “कुल“ को अभी परिभाषित किया जाना चाहिए और हम इसके प्रति स्पष्ट हो लें। लेकिन ऐसा यदि बाद में भी किया जा सकता हो तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है।
उपाध्यक्ष महोदय : यदि खंड 7 में इसे स्वीकार नहीं किया जाता है तो यहां यह परिभाषा बेकार हो जाएगी। लेकिन दूसरी ओर यदि इसे स्वीकार कर लिया जाता है और परिभाषा की आवश्यकता महसूस होती है तो एक संशोधन इसमें तदनुसार कर दिया जाएगा। मैं दरवाजे बन्द नहीं कर रहा हूँ।
डॉ. अम्बेडकर : अथवा एक स्पष्टीकरण दिया जा सकता है कि ’कुल’ से क्या अभिप्रेत है।
उपाध्यक्ष महोदय : खंड 3 अभी पूरा नहीं हुआ है अथवा जैसा कि माननीय विधि मंत्री जी ने कहा हम इसे स्पष्टीकरण में शामिल कर सकते हैं।
कैप्टन ए. पी. सिंह : तब तो इसे स्थगित रखा जा सकता है।
उपाध्यक्ष महोदय : अब हम खंड 4 पर विचार करेंगे।
खंड 4 - (कोड का अभिभावी प्रभाव)
डॉ. अम्बेडकर : मैं प्रस्ताव करता हूँ कि :
खंड 4 के स्थान पर निम्नलिखित को रखा जाएगा :
“4. कोड का अभिभावी प्रभाव : जब तक इस कोड में अन्यथा उपबंधित न हो :-
(क) इस कोड में उल्लिखित किसी भी मामले के संबंध में इस कोड की शुरुआत
से तत्काल पहले प्रभावी हिंदू कानून के किसी पाठ, नियम अथवा व्याख्या
अथवा किसी प्रथा अथवा रूढि़ का प्रभाव समाप्त हो जाएगा; और
(ख) इस कोड की शुरुआत से तत्काल पहले प्रभावी किसी अन्य कानून, जहां
तक वह इस कोड में निहित किसी भी प्रावधान से असंगत है, का प्रभाव
समाप्त हो जाएग’’।