हिंदू कोड-जारी - Page 502

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इस संशोधन का प्रयोजन इस प्रकार है। जैसा कि सदन को ज्ञात होगा कि मूलतः केवल एक खंड था और कोई उप-खंड नहीं था और प्रथा और कानून की व्याख्या के संबंध में और इसके अलावा पारित एवं प्रभावी अन्य कानूनों के संबंध में इस कोड के प्रावधान एक साथ रख दिए गए थे। यह महसूस किया गया था कि इस विधेयक का मंतव्य सभी कानूनों का निरसन करना नहीं था, बल्कि केवल उन्हीं का निरसन करना था जो इस विधेयक के प्रावधानों से असंगत थे। इसलिए मैंने महसूस किया कि सबसे अच्छा तरीका खंड 4 को (क) और (ख) में विभाजित करना है, जिसमें से नियम, व्याख्या और प्रथा को (क) में रखा जाएगा और प्रभावी कानून को (ख) में रखा जाएगा और शर्त यह रहेगी कि किसी भी कानून का निरसन नहीं किया जाएगा जब तक वह इस कोड से असंगत न हो। हमारी यह मंशा नहीं है कि हम इसके द्वारा सभी कानूनों का निरसन कर दें। इस कोड का यही प्रयोजन है।

उपाध्यक्ष महोदय : प्रस्तावित संशोधन इस प्रकार है :

खंड 4 के लिए अंतःस्थापित करें;

“4. कोड का अभिभावी प्रभाव : जब तक इस कोड में अन्यथा उपबंधित न हो ः-

(क) इस कोड में उल्लिखित किसी भी मामले के संबंध में इस कोड की शुरुआत

से तत्काल पहले प्रभावी हिंदू कानून के किसी पाठ, नियम अथवा व्याख्या

अथवा किसी प्रथा अथवा रूढि़ का प्रभाव समाप्त हो जाएगा; और

(ख) इस कोड की शुरुआत से तत्काल पहले प्रभावी किसी अन्य कानून, जहां

तक वह इस कोड में निहित किसी भी प्रावधान से असंगत है, का प्रभाव

समाप्त हो जाएगा“।

डॉ. देशमुख : मैं प्रस्ताव करता हूँ कि :

डॉ. अम्बेडकर द्वारा प्रस्तुत संशोधन में प्रस्तावित खंड 4 के भाग (क) में “अथवा किसी प्रथा अथवा रूढि़“ शब्दों का लोप किया जाएगा।

मैं इस पर अभी बोलूँ या बाद में?

उपाध्यक्ष महोदय : सबसे पहले मैं उन संशोधनों को देखूँगा जिन्हें माननीय सदस्य प्रस्तावित करना चाहते हैं और फिर उन पर चर्चा की अनुमति दूँगा। प्रस्तावित संशोधन इस प्रकार हैः

डॉ. अम्बेडकर द्वारा प्रस्तुत संशोधन में प्रस्तावित खंड 4 के भाग (क) में “अथवा किसी प्रथा अथवा रूढि़“ शब्दों का लोप किया जाएगा।“