488 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
डॉ. अम्बेडकर : मैं इसे समझा नहीं।
उपाध्यक्ष महोदय : यह इस प्रकार है कि यदि कोई प्रथा है तो वह जारी रहेगी। मैं यह समझता हूँ कि इस संशोधन का उद्देश्य यह है कि इस कोड में किसी प्रावधान के होते हुए भी इस कोड के प्रवृŸा होने से पहले प्रभावी कोई भी प्रथा, जिसका निरसन किया जा रहा है उस पर अभिभावी होगी। क्या यही मंतव्य है?
डॉ. देशमुख : जी, हां।
उपाध्यक्ष महोदय : हम दो बातें मान लेंगे। जहां कहीं उपबंधित नहीं है, वहां प्रथा जारी रहेगी, इसमें कोई संदेह नहीं है। परन्तु यहां यदि कोई उपबंध किया गया है तो उस प्रथा का निरसन किया जाएगा। यदि कोई प्रथा असंगत है तो संशोधन द्वारा उसका निरसन कर दिया जाएगा। माननीय सदस्य चाहते हैं कि प्रथा कानून के पाठ पर अभिभावी रहनी चाहिए चाहे यहां उपबंधित हो अथवा उन मामलों में भी जहां उपबंधित नहीं है। यही स्थिति है। इस पर उत्तर देने के लिए मैं बाद में कहूँगा।
सरदार हुकम सिंह : मैं प्रस्ताव करता हूँ कि :
खंड 4 में “अथवा किसी प्रथा अथवा रूढि़“ शब्दों का लोप किया जाएगा।
उपाध्यक्ष महोदय : यह तो वही बात हुई।
सरदार हुकम सिंह : मेरा सुझाव यह है कि इस अधिनियम के बावजूद प्रथा जारी रहेगी।
उपाध्यक्ष महोदय : प्रस्तुत संशोधन इस प्रकार है :
खंड 4 में “अथवा किसी प्रथा अथवा रूढि़“ शब्दों का लोप किया जाएगा।
पंडित ठाकुर दास भार्गव : मैं प्रस्ताव करता हूँ कि :
खंड 4 के स्थान पर निम्नलिखित को रखा जाएगा :
“4. इस कोड के प्रवृŸा होने से तत्काल पूर्व लागू हिंदू कानून का कोई पाठ, नियम अथवा व्याख्या अथवा किसी परम्परागत रूढि़ उस मामले के संबंध में प्रभावी रहेगा जिसका उल्लेख कोड में नहीं किया गया है।“
यह इस मामले का सकारात्मक पक्ष है।
उपाध्यक्ष महोदय : जिस किसी बात का प्रावधान इस कोड में नहीं किया गया है, वह प्रभावी रहेगी।