हिंदू कोड-जारी - Page 504

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डॉ. अम्बेडकर : ऐसा ही होगा, जब हम खंड 55 को पूरा कर लेंगे।

पंडित ठाकुर दास भार्गव : मेरा कहना यही है कि ये बातें सकारात्मक तथ्य के रूप में रहेंगी और दोनों के बीच कोई विशेष अंतर नहीं है।

उपाध्यक्ष महोदय : प्रस्तुत संशोधन इस प्रकार है :

“4. इस कोड के प्रवृŸा होने से तत्काल पूर्व लागू हिंदू कानून का कोई पाठ, नियम अथवा व्याख्या अथवा किसी परम्परागत रूढि़ उस मामले के संबंध में प्रभावी रहेगा जिसका उल्लेख कोड में नहीं किया गया है।“

पंडित ठाकुर दास भार्गव : मेरे नाम एक और संशोधन है जो सं. 449 है। मैं प्रस्ताव करता हूँ कि :

खंड 4 के स्थान पर निम्नलिखित को रखा जाएगा :

“4. इस कोड के प्रवृŸा होने से तत्काल पहले प्रभावी कोई भी प्रथा अथवा रूढि़ हिंदू कानून के सभी पाठें, नियम अथवा व्याख्या पर अथवा किसी दूसरे कानून के प्रावधान पर बाध्यकारी एवं अभिभावी होगी और विवाह तथा विवाह-विच्छेद से संबंधित सभी मामलों में पूर्वोदाहरण होगी।“

यह धारा 4 के विपरीत है और मेरे माननीय मित्र डॉ. अम्बेडकर ’प्रथा’ को जो स्थान देना चाहते हैं, जिसमें मैं व्यक्तिगत रूप से सहमत नहीं हूँ, उसकी केवल विडम्बना दर्शाने के लिए है।“

उपाध्यक्ष महोदय : मैं इन्हें श्रेणियों में विभाजित करने का प्रयास कर रहा हूँ ताकि मैं किसी समूह विशेष के अंतर्गत सभी संशोधनों को रख सकूँ। संशोधन सं. 128 प्रथा से संबंधित है, जहां इस विधेयक में कानून का कोई प्रावधान नहीं है। इसके बाद संशोधन सं. 449 में कहा गया है कि इस विधेयक में किसी प्रावधान के होते हुए भी पिछली सभी प्रथाएं यथावत् रहेंगी।

श्री संथानम : यह तो खंड 4 का प्रत्यक्ष अस्वीकरण है।

उपाध्यक्ष महोदय : प्रस्तुत संशोधन इस प्रकार है :

खंड 4 के लिए निम्नलिखित अंतःस्थापित किया जाए :

“4. इस कोड के प्रवृŸा होने से तत्काल पहले प्रभावी कोई भी प्रथा अथवा रूढि़ हिंदू कानून के सभी पाठों, नियम अथवा व्याख्या पर अथवा किसी दूसरे कानून के प्रावधान पर बाध्यकारी एवं अभिभावी होगी और विवाह तथा विवाह-विच्छेद से संबंधित सभी मामलों में पूर्वोदाहरण होगी।“