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“4. पवित्र पुस्तकों में अथवा भारत में उच्च न्यायालयों के न्यायिक निर्णयों में अथवा प्रिवी कौंसिल की न्यायिक समितियों के निर्णयों अथवा विद्वान लेखकों एवं मनीषियों की पाठ्य पुस्तकों एवं टीकाओं में हिंदू कानून के सभी नियमों की व्याख्या से संबंधित सभी पाठ एवं इस कोड के प्रवृŸा होने से तत्काल पहले प्रभावी सभी प्रथाएं एवं रूढि़यां, जो इस कोड से असंगत हैं, असंगति की सीमा तक प्रभावहीन होंगी।“
श्री झुनझुनवाला : मैं प्रस्ताव करता हूँ कि :
खंड 4 में निम्नलिखित परंतुक को जोड़ा जाएगा :
“बशर्ते कि यह जिसे हिंदू धर्म अथवा किसी अन्य धर्म की स्वीकृति प्राप्त है, जिस धर्म अथवा धर्मों के अनुयायियों पर यह कोड लागू होगा :
बशर्ते कि यह कोड इस कोड के प्रवृŸा होने से तत्काल पहले प्रभावी हिंदू कानून के किसी पाठ, नियम अथवा व्याख्या अथवा किसी प्रथा अथवा रूढि़ अथवा किसी अन्य कानून पर अभिभावी नहीं होगा, जिसे नैतिकता की स्वीकृति प्राप्त है।“
महोदय, इसके बाद मेरा एक और संशोधन है, जिसकी सं. 418 है।
उपाध्यक्ष महोदय : क्या इसमें भी संशोधन सं. 130 की बात दोहराई गई है?
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श्री झुनझुनवाला : इसमें दोहराव नहीं है, यह थोड़ा अलग है। मैं प्रस्ताव करता हूँ कि :
डॉ. अम्बेडकर द्वारा प्रस्तावित संशोधन में, निम्नलिखित परंतुक को प्रस्तावित
खंड 4 में जोड़ा जाएगा :
“बशर्ते कि यह कोड ऐसी मौजूदा रूढि़यों, प्रथा तथा कानून पर अभिभावी नहीं होगा, जो लोगों के किसी वर्ग, जिन पर यह कोड लागू है, की विशिष्ट संस्कृति का भाग है।“
उपाध्यक्ष महोदय : इसका निर्णय कौन करेगा कि विशिष्ट संस्कृति क्या है?
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जहां तक किसी कोड का संबंध है, चाहे उसकी विषय-वस्तु कुछ भी हो, सदन के समक्ष प्रस्तुत करने से पहले उसमें कुछ निश्चित बात होनी चाहिए जो न्यायालय में प्रवŸार्नीय हो।
श्री झुनझुनवाला : इसका उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 29 में है कि समाज के विभिन्न वर्गों की संस्कृति भिन्न-भिन्न है और इसका संरक्षण किया जाना चाहिए।