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उपाध्यक्ष महोदय : इस खंड में यह कैसे आ गया? कोई भी संशोधन उसी खंड से संबंधित होना चाहिए जिस पर विचार किया जा रहा है।
श्री सरवटे : क्योंकि यह उन सभी कानूनों का अधिक्रमण करेगा जो असंगत हैं। यह खंड अभी जिस रूप में है, यह अपने प्रभाव से उन सभी कानूनों का अधिक्रमण करता है जो किसी राज्य ने पहले पारित किए होंगे। इस संशोधन के द्वारा मैं उन्हें यह शक्ति देना चाहता हूँ कि यदि वे चाहें तो भविष्य में उन्हें बहाल कर सकते हैं। कुछेक प्रावधान ऐसे हो सकते हैं जो इस राज्य पर लागू नहीं होते हो। उस राज्य को यदि उसे संविधान के अंतर्गत अन्यथा विधान बनाने की शक्ति होनी चाहिए और इस खंड के प्रभाव के कारण उसे आगे विधान बनाने से निवारित नहीं किया जाना चाहिए।
उपाध्यक्ष महोदय : इस संशोधन से क्या अभिप्रेत है, यह मेरी समझ में नहीं आया है। इस संशोधन का संबंध यदि है तो वह खंड 1 से होना चाहिए। इसके अलावा मेरा
ख्याल है कि हमने खंड 2 के संदर्भ में भी इसी प्रकार का संशोधन निपटाया है।
डॉ. अम्बेडकर : पंडित मालवीय का संशोधन भी लगभग इसी आशय का था।
उपाध्यक्ष महोदय : इसके अलावा यह एक समवर्ती विषय है। यदि स्थानीय स्थितियों और परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में किसी राज्य विधानमंडल को कोई कानून बनाना अपेक्षित हो तो उस कानून को राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हो जाती है, तो उस सीमा तक ही प्रांतीय कानून इस कानून पर अभिभावी होगा या इसे संशोधित करेगा। राष्ट्रपति की स्वीकृति के बिना किसी प्रांतीय कानून का अभिभावी प्रभाव नहीं हो सकता है। हम अप्रत्यक्ष रूप से यह कहने का प्रयास कर रहे हैं कि संविधान के अंतर्गत राष्ट्रपति की स्वीकृति की आवश्यकता होते हुए भी कोई प्रांतीय विधानमंडल किसी समवर्ती विषय पर कानून पारित कर सकता है। आप राष्ट्रपति के अधिकार को कैसे समाप्त कर सकते हैं। मुझे तो यह असंवैधानिक प्रतीत होता है।
श्री सरवटे : संविधान के प्रावधानों का अधिक्रमण नहीं किया जा रहा है; वे भी इसके साथ ही हैं। यदि किसी प्रांतीय विधानमंडल के लिए वह पूर्वापेक्षा आवश्यक है, तो वह पूर्वापेक्षा संलग्न है। इसका तात्पर्य यह नहीं कि उसे समाप्त किया गया है।
उपाध्यक्ष महोदय : यह उस पूर्ण प्रावधान को समाप्त कर देती है कि केन्द्रीय विधान मंडल और राज्य विधानमंडल द्वारा पारित कानूनों के बीच कोई विसंगति नहीं होनी चाहिए। अपवादात्मक परिस्थितियों को छोड़कर राज्य विधानमण्डल को ऐसे कानून बनाने का अधिकार नहीं दिया जा सकता है। राष्ट्रपति की स्वीकृति अवश्य