494 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
होनी चाहिए। मैं नहीं जानता कि इन सब पर अभिभावी प्रावधान हम कैसे पारित कर सकते हैं। इसी आधार पर सदन द्वारा खंड 2 के अन्तर्गत मतदान भी किया जा चुका है। यह संविधान के प्रावधानों के भी विरुद्ध है। क्या यह जरूरी है कि हम इस संशोधन पर विचार करें? क्या कोई और संशोधन भी है?
डॉ. सी. डी. पाण्डे (उत्तर प्रदेश) : महोदय, मेरा एक संशोधन है?
उपाध्यक्ष महोदय : क्या सभापटल पर रख दिया गया है?
डॉ. सी. डी. पाण्डे : रख दिया गया है परन्तु अब तक सूची में नहीं आया है। मेरे पास एक प्रति है।
डॉ. अम्बेडकर : मेरे पास इसकी प्रति नहीं है।
डॉ. सी. डी. पाण्डे : कम से कम मुझे तो एक प्रति उपलब्ध करा दी गई है।
उपाध्यक्ष महोदय : सूचना कब दी थी?
डॉ. सी. डी. पाण्डे : आज सुबह ही मैंने नोटिस ऑफिस में सूचना दी थी और वहां से मुझे यह प्रति दी गई है। इसे प्रस्तुत किया जाना है। बात चाहे कुछ भी हो, नोटिस ऑफिस ने मुझे यह प्रति दी है तो माननीय विधि मंत्री जी को भी एक प्रति दी गई होगी।
उपाध्यक्ष महोदय : संशोधन तो प्रत्येक दिन प्रातः से आने लगते हैं। यह अपनी तरह का अनोखा है। इसी प्रकार के संशोधन और भी आए थे। ऐसे संशोधनों की सूचना के लिए मैं छूट नहीं देना चाहता जब तक इस विधेयक को प्रस्तुत करने वाले माननीय मंत्री जी उन्हें स्वीकार करने के लिए इच्छुक हों।
पंडित ठाकुर दास भार्गव : महोदय, आपकी अनुमति से मैं संशोधन सं. 420 प्रस्तुत करना चाहता हूँ जो मेरे नाम पर है।
उपाध्यक्ष महोदय : वही संशोधन दूसरे रूप में।
पंडित ठाकुर दास भार्गव : यह अलग है। यहां छोटी-सी त्रुटि है; टाइप गलत किया गया है। इसे “जहां तक यह असंगत है“ होना चाहिए।
उपाध्यक्ष महोदय : उसका प्रावधान कर दिया गया है।
पंडित ठाकुर दास भार्गव : उसका प्रावधान नहीं किया गया है। मूल खंड 4 इस प्रकार है :
“जब तक इस कोड में अन्यथा उपबंध न किया गया हो, आदि....“ ये शब्द नहीं हैं।