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डॉ. अम्बेडकर : ये शब्द हैं :
“जब तक इस कोड में अन्यथा उपबंध न किया गया हो“
पंडित ठाकुर दास भार्गव : मैं कहता हूँ कि जहां तक इस कोड का संबंध है कोई भी प्रथा प्रभावी नहीं रहेगी।
उपाध्यक्ष महोदय : मामलों का उल्लेख विधेयक में अवश्य किया गया होगा।
पंडित ठाकुर दास भार्गव : वह जरूरी नहीं है। हम प्रावधान करते हैं कि प्रथा की व्यावृत्ति की जाती है और उस धारा के बल से प्रथा की व्यावृत्ति की जाती है।
उपाध्यक्ष महोदय : आइए देखें कि आपत्ति सिद्धांत क्या है। यह खंड कहता है कि प्रथा चाहे जो हो, जब तक विधेयक में उसका प्रावधान है, किसी विशिष्ट छूट के मामले को छोड़कर इस कोड के प्रावधान लागू रहेंगे। उनकी आपत्ति क्या है?
पंडित ठाकुर दास भार्गव : यह पुराने खंड 4 का संशोधन है। उसमें विसंगति आदि का कोई प्रश्न ही नहीं है।
उपाध्यक्ष महोदय : केवल उन्ही मामलों में, जहां यह असंगत है, कानून को अभिभावी होना चाहिए। यदि नहीं है, तो यह जारी रह सकता है।
पंडित ठाकुर दास भार्गव : यह मूल खंड 4 का संशोधन है। यह नए खंड 4 से बिल्कुल अलग है। यदि आप डॉ. अम्बेडकर द्वारा प्रस्तुत संशोधन को स्वीकार कर लेते हैं तो यह अनावश्यक है।
डॉ. अम्बेडकर : वह मेरा संशोधन है।
पंडित ठाकुर दास भार्गव : मैं आपके संशोधन से सहमत हूँ; परन्तु मैंने एक अलग संशोधन प्रस्तुत किया है।
डॉ. अम्बेडकर : सदन के सामने जो संशोधन है, वह मेरा है।
पंडित ठाकुर दास भार्गव : मूल खंड 4 में विसंगति के प्रश्न पर विचार नहीं किया गया है।
उपाध्यक्ष महोदय : इस संशोधन की क्या जरूरत है, मैं समझ नहीं पाया हूँ।
श्री संथानम : वह मूल शब्दों को बहाल करना चाहते हैं कि विसंगति की सीमा तक प्रथा अवैध होनी चाहिए।
डॉ. अम्बेडकर : हमने मूल खंड में भी ’असंगत’ शब्द का प्रयोग नहीं किया है। मूल खंड इस प्रकार था :