खंड 2 : (संहिता का प्रयोग) - Page 51

36 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

नहीं जाएगा। उनको इसकी छूट होगी कि वे इससे शासित हों या नहीं। यह उन सुधारकों को भी संतुष्ट करेगा जो इस अधिनियम को इसी प्रकार चाहते हैं क्योंकि तब वे यह घोषणा कर सकेंगे कि वे इस विधेयक से शासित होना चाहते हैं। इन सुझावों के साथ मैं अपने संशोधनों को स्वीकृत किए जाने की सदन से सिफारिश करता हूँ।

मेरा वैकल्पिक संशोधन भी इसी आधार पर है लेकिन यह संहिता का संचालन केवल हिंदुओं तक सीमित कर देगा। मेरे प्रथम संशोधन के अनुसार, मैं चाहूँगा, पूरी संहिता किसी रूप में पारित हो जाए, सारे राष्ट्र पर लागू होनी चाहिए बशर्तें कि यह उन्हीं पर लागू होगी जो यह घोषित करेंगे कि वे इससे शासित होना चाहते हैं। लेकिन यदि यह सुझाव किसी को भी, किसी भी कारण से मान्य नहीं है तब मैं अपने दूसरे संशोधन के अनुसार प्रस्ताव रखूँगा कि संहिता हिंदुओं, सिखों और जैनों पर लागू होनी चाहिए जैसा कि दिया हुआ है, लेकिन उसमें भी केवल उन्हीं हिन्दुओं, जैनों, सिखों और बौद्धों पर जो घोषणा के द्वारा कहें कि वे इससे शासित होना चाहते हैं।

* डॉ. देशमुख : जहाँ तक इन संशोधनों का सम्बन्ध है मैं दो बातें कहना चाहता हूँ। यहाँ बहुत से संशोधन प्रस्तुत किए गए लेकिन सबसे पहले श्री सरवटे के संशोधन पर बोलना चाहूँगा और फिर माननीय डॉ. अम्बेडकर द्वारा प्रस्तुत संशोधन पर। संवैधानिक आधार पर मेरी रुचि श्री सरवटे के संशोधन को समर्थन की होती है जो संविधान के कारण को आगे बढ़ाता है, अगर यह स्वीकृत हो तो इसे प्रगति की आवश्यकता है। मेरा अपना विचार है इस सदन के सदस्यों का एक वर्ग जो हमें संविधान ने दिया है को बहुत गम्भीरता से नहीं लेता। मैं प्रार्थना करता हूँ कि आप मुझे कुछ मिनट अनुच्छेद 44 को प्रस्तुत करने का दे जिसमें कहा गया है-

‘‘राज्य का प्रयास भारत के पूरे भू-भाग में सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करना होगा।’’

यह अनुच्छेद राज्य नीति के निर्देश सिद्धांतों से है। यद्यपि यह कल्पना नहीं की जा सकती कि सरकार का कोई भी निर्णय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एक तरफ रख दिया जाएगा या अवैध और इसके लिए कानून के प्रतिकूल माना जा सकता है, मैं नहीं जानता कि क्या सर्वोच्च न्यायालय व्यवस्था निदेश देने के लिए सक्षम होगा लेकिन अगर हम संविधान में दिए राज्य नीति के निर्देश सिद्धांतों के मूल्य को समझें या इस पर गंभीरता से विचार करें तो मैं नहीं सोच सकता इस संहिता को पारित करके हम भारत के पूरे भू-भाग के सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक

* सं. वा-वि. भाग VIII, खंड II, 5 फरवरी, 1951 पृष्ठ 2392-2404