हिंदू कोड-जारी - Page 512

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पर नहीं जाएंगे। परन्तु संशोधन में यह सुझाव दिया गया प्रतीत होता है कि केवल उन्ही मामलों में जहां प्रावधान कोड के प्रावधान से असंगत हैं, उस कोड के प्रावधान प्रभावी रहेंगे।

श्री श्यामनंदन सहाय : मेरा मुद्दा ठीक यही है।

उपाध्यक्ष महोदय : प्रस्तावित संशोधन इस प्रकार है :

डॉ. अम्बेडकर द्वारा प्रस्तावित संशोधन में प्रस्तावित खंड 4 के भाग (क) में “यह कोड“ शब्दों के बाद जहां यह दूसरी बार आता है “जहाँ तक यह इस कोड में निहित किसी भी प्रावधान से असंगत है“ शब्द अंतःस्थापित किए जाएंगे।

और इस प्रकार निम्नलिखित संशोधन प्रस्तावित किए जाते हैं :

डॉ. अम्बेडकर का संशोधन सं. 6, डॉ. देशमुख का संशोधन सं. 450, सरदार हूकुम सिंह का संशोधन सं. 129, पंडित ठाकुर दास भार्गव के संशोधन सं, 128, 420, और 449, श्री नजीरुद्दीन अहमद के संशोधन सं. 380 और 419, श्री झुनझुनवाला के संशोधन सं. 130 और 418 और श्री श्यामनंदन सहाय का संशोधन सं. 417।

ये संशोधन और खंड अब चर्चा के लिए प्रस्तुत किए जाते हैं।

डॉ. देशमुख : यह अत्यंत महत्वपूर्ण खंड है और इसका महत्व और बढ़ गया है क्योंकि वर्तमान कानून के प्रावधान केवल विवाह और विवाह-विच्छेद से संबंधित प्रावधानों तक ही सीमित रहेंगे। यही कारण है कि मैं यह कहने जा रहा था कि जहाँ तक खंड 3 का संबंध है, “प्रथा और रूढि़“ शब्दों की परिभाषा करने की बहुत अधिक आवश्यकता नहीं थी। इसके अलावा मेरा विचार था कि जहाँ तक विवाह और विवाह -विच्छेद का संबंध है, आम राय यह थी कि प्रथा, वर्जना नहीं होनी चाहिए और इसके मानने पर उस सीमा तक रोक नहीं लगाई जानी चाहिए जैसी कि तब लगाई जाती जब हम इस कोड के प्रावधानों में वंशानुक्रम एवं उत्तराधिकारी को भी शामिल करते। इसलिए मेरा विचार था कि चूँकि हम इसे केवल विवाह और विवाह-विच्छेद तक ही सीमित रखने जा रहे हैं अतः प्रथा और रूढि़ को परिभाषित करना और खंड 4 में प्रावधान करना इतना ज्यादा महत्वपूर्ण भी नहीं है। इसलिए मेरा सुझाव है कि जहां तक परिभाषा के शब्द विन्यास का संबंध है खंड 3, से परिभाषा का भी लोप कर दिया जाना चाहिए। मैं विद्वान डॉक्टर साहब से पूरी तरह सहमत हूँ क्योंकि यह इस विषय पर दिए गए विनिर्णयों के पूर्णतः अनुकूल है और उसमें एक शब्द भी ऐसा नहीं है जिस पर कोई आपत्ति की जा सकती हो। वास्तव में इसका दायरा उदार और व्यापक है।