498 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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क्योंकि इसमें उन बातों को शामिल किया गया है जिन्हें लंबे समय से सतत् रूप से माना जा रहा है और यहां तक कि पारिवारिक प्रथाओं को भी मान्यता दी गई है। इस दृष्टि से परिभाषा में आपत्ति योग्य कुछ भी नहीं है। परन्तु जहाँ तक विधेयक के अधिकांश प्रावधानों का संबंध है, मैं चाहूँगा कि माननीय मंत्री जी पूरे मामले के संबंध में इस बात का ध्यान रखेंगे कि प्रावधानों को केवल विवाह और विवाह-विच्छेद तक ही सीमित रखा जाएगा। अब जैसा कि उन्होंने स्वयं स्वीकार किया था, यहां इस विधेयक में कई ऐसी बातें हैं, कई प्रावधान हैं जिन्हें विशिष्ट रूप से अन्य प्रावधानों को विशेष तरीके से नियंत्रित करने के लिए रखा गया है, मैं चाहूँगा कि वह उन कुछेक प्रावधानों को देखें, जिन तक हम अपनी चर्चा सीमित रखना चाहते हैं। यदि वे ऐसा करते हैं तो मेरा विचार है कि इस खंड में भी कुछ बदलाव करने जरूरी होंगे जिसका प्रथाओं और रूढि़यों के साथ-साथ इस समय प्रचलित हिंदू कानून की व्याख्या पर अभिभावी प्रभाव है।
यदि हम डॉ. अम्बेडकर के संशोधन में दिए गए सुझाव के अनुसार इस खंड को पारित कर देते हैं तो हम निश्चित रूप से जो हमारा मंतव्य है उससे भी आगे चले जाएंगे। खंड 4 के उप-खंड (क) में कहा गया है कि :
इस कोड के प्रवृत्त होने से तत्काल पहले लागू हिंदू कानून का कोई भी पाठ नियम अथवा व्याख्या अथवा कोई प्रथा अथवा रूढि़ इस कोड में उल्लिखित किसी भी मामले के संबंध में प्रभावी नहीं रहेगी।“
यदि इसकी सही व्याख्या की जाए तो इसका अभिप्राय यह होगा कि जहां तक विवाह और विवाह-विच्छेद का संबंध है, सभी प्रथाएं और रूढि़यां वर्जित हो जाएंगी क्योंकि ये इस कोड से संबंधित मामले हैं।
श्री जे. आर. कपूर : जब तक विशेष रूप से व्यावृत्ति न की जाए।
डॉ. देशमुख : मैं इस संशोधन से पूर्णतः सहमत हूँ, जिसकी सूचना मेरे मित्र श्री सहाय ने दी थी। चूँकि ये शब्द आपने यहां रखे हैं, जब आप विवाह और विवाह विच्छेद विषय पर कानून बना रहे हैं तो जहां तक मेरी समझ है, किसी भी प्रथा या रूढि़ को मान्यता प्रदान करना संभव नहीं है।
डॉ. अम्बेडकर : हम कुछ बातों की व्यावृत्ति कर रहे हैं।
डॉ. देशमुख : तब तक नहीं जब तक व्यावृत्ति को लिखा न जाए।
डॉ. अम्बेडकर : खंड “जब तक स्पष्ट रूप से अन्यथा उपबंधित न हो“ शब्दों से शुरू होता है।