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डॉ. देशमुख : जहां तक इस मामले पर मेरे विचारों का संबंध है, विवाह और विवाह-विच्छेद में प्रथा की भूमिका होनी चाहिए। हमारे समक्ष पंजाब का उदाहरण है जो विशिष्ट कानूनी प्रावधानों के बजाए प्रथा द्वारा अधिक नियंत्रित है।
डॉ. अम्बेडकर : हम पंजाब के लोगों को उठाकर अपने स्तर तक लाना चाहते हैं।
डॉ. देशमुख : उस दृष्टिकोण से ही मैंने “किसी प्रथा अथवा रूढि़ शब्दों का लोप करने के उद्देश्य से एक संशोधन सभापटल पर रखा है ताकि कोई भी प्रथा अथवा रूढि़ जो खंड 3 के विरुद्ध नहीं है अथवा जो खंड की अपेक्षओं को पूरा करती है, जारी रखी जानी चाहिए। यदि ऐसा नहीं किया जाता तो, माफ कीजिएगा, परवर्ती
खंडों का कोई दूसरा प्रावधान हमारे लिए सहायक नहीं होगा। जहां तक मैं समझ पाया हूँ, उसके अनुसार यदि खंड 4 का भाग (क) यथारूप स्वीकार कर लिया जाता है, चाहे सदन की यह आकांक्षा हो कि कानून के प्रावधानों के साथ-साथ प्रथा और रूढि को भी मान्यता प्रदान की जाए, तो भी इन्हें मान्यता का जामा पहनाना संभव नहीं होगा।
इसलिए “किसी प्रथा अथवा रूढि़“ शब्दों का लोप किया जाना ही श्रेयस्कर होगा। मेरे कुछ मित्रों ने तो यहां तक कहा है कि इसे सदैव कानून के प्रावधानों पर अभिभावी होना चाहिए, जैसा कि पंडित भार्गव का भी सुझाव है। वह बात तब संभवतः खंड 4 के ठीक विपरीत होगी। ऐसा करना न केवल उक्त खंड का लोप करना होगा, बल्कि उसे विपरीत दिशा में रखने के समान होगा।
श्री जे आर कपूर : यह तो कोड को ही नकारने जैसा होगा।
डॉ. देशमुख : मैं सहमत हूँ कि यह कोड को नकारना होगा। मेरा निवेदन यह है कि जब तक हम इस अधिनियम द्वारा किसी मान्य प्रथा या रूढि़ को निषिद्ध नहीं करते, तब तक उसके जारी रहने की पर्याप्त गुंजाइश रहेगी। मैं नहीं समझता कि उप-खंड (क) को यथावत छोड़ देना सही होगा। मूल खंड इस आशय का था कि इस कोड में उल्लिखित किसी भी मामले के संबंध में इस कोड के प्रवृत्त होने से तत्काल पहले प्रभावी नहीं रहेगा। इसकी तुलना में हमने स्थिति में थोड़ा-सा संशोधन किया है कि हम इस कानून को केवल विवाह और विवाह-विच्छेद तक सीमित रखना चाहते हैं। मैं चाहूँगा कि रूढि़ और प्रथा को जारी रखा जाना चाहिए क्योंकि यह समय की कसौटी पर खरी उतरी हैं, यह अधिक सुविधाजनक और कम महंगी है और लोगों के लिए इसके कम कष्टकर होने की संभावना हैं मेरा निवेदन है कि मैंने जो संशोधन प्रस्तुत किया है उसके पक्ष में कहने के लिए बहुत कुछ है।