500 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
सरदार हुकम सिंह : मैंने भी अपना संशोधन प्रस्तुत किया है जिसका मंतव्य डॉ.
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देशमुख द्वारा प्रस्तुत किए गए संशोधन के समान है। मेरे विद्वान मित्र ने अभी जो कुछ भी कहा है उससे मैं पूरी तरह सहमत हूँ, लेकिन उसके अलावा मैं कुछ और मुद्दे प्रस्तुत करना चाहता हूँ। खंड 3 में हमने अभी प्रथा और रूढि़ को परिभाषित किया है और किस प्रकार हमने उदात्त और महिमा मंडित किया है वह उसमें प्रयुक्त शब्दों से ही स्पष्ट है :
“प्रथा“ और “रूढि़“ अभिव्यक्तियां किसी नियम की द्योतक हैं, जिसका पालन निरंतर एवं एकसमान रूप से किया जाता रहा है और इसने किसी स्थानीय क्षेत्र, जनजाति, समुदाय, समूह अथवा परिवार के हिंदुओं के बीच कानून का बल प्राप्त कर लिया है :
बशर्ते कि यह नियम निश्चित हो और अनुपयुक्त अथवा सार्वजनिक नीति के विरुद्ध न हो।“
मैं निवेदन करना चाहता हूँ कि जब हमने परिभाषा निर्धारित कर ली है और यह भी निर्धारण कर लिया है कि मान्यता प्रदान करने की दृष्टि से कोई रूढि़ अथवा प्रथा क्या है, और इसके तुरंत बाद हम खंड 4 में इस पर एक घातक प्रहार कर रहे है। एक माननीय सदस्य : एक व्यावृत्ति है।
सरदार हुकम सिंह : हर कहीं व्यावृत्ति है, प्रत्येक खंड में आप कहते हैं कि जो
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कुछ उचित समझा गया है, उसकी व्यावृत्ति कीजिए। लेकिन मैं इसे दूसरे तरीके से देखता हूँ। इसका तात्पर्य यह नहीं होना चाहिए कि प्रत्येक खंड के लिए जहां कोई छूट जरूरी समझी गई है यह कहते हुए एक व्यावृत्ति खंड जोड़ दिया जाए कि अमुक अमुक प्रथा की व्यावृत्ति की जानी चाहिए। जब इसे कानून का दर्जा प्राप्त है तो क्यों न इसकी पूर्ण व्यावृत्ति की जाए? यह कल्पना नहीं की जा सकती कि यह इतनी अस्पष्ट है, इतनी अनिश्चित है अथवा इतनी अनिरंतर है कि आप इस तक पहुंच नहीं सकते या इसे खोज नहीं सकते हैं। यह न केवल आम जनता के होठों पर और हृदय में है, बल्कि मैं तो इस बात का दावा भी कर सकता हूँ कि यह सार्वजनिक प्रलेखन में भी पहले से निर्धारित है और इसे मनमाने तरीके से बदला नहीं जा सकता है। यदि कोई यह कहता है कि इसका परिणाम मुकदमेबाजी होगा तो मैं भी प्रत्यारोप कर सकता हूँ कि संहिताबद्ध कानूनों में भी सदैव विवाद होते हैं, यहां तक कि पंजीकृत दस्तावेजों और पंजीकृत तथ्यों में भी विवाद होते हैं। मैं मायने के कथन को सुनाना चाहूँगा :