508 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
सरदार हुकम सिंह : मैं माफी चाहता हूँ कि मेरी बात समझी नहीं गई है। जो कुछ मैं कहना चाहता था वह इस प्रकार है। मैं केवल इस बात की हिमायत कर रहा हूँ कि रूढि़ और प्रथा कानून पर अभिभावी रहे। इसकी हिमायत करते हुए मैं रूढि़ और प्रथा की उपादेयता को स्पष्ट कर रहा हूँ। कानून के मुकाबले इसने कितनी प्रगति की है और इसे बनाए क्यों रखा जाना चाहिए यह बता रहा हूँ तथा प्रथा और दूसरे कानूनों के बीच का अंतर भी बता रहा हूँ। इसी सम्बंध में मैं पुत्र का उल्लेख कर रहा हूँ। मैं “पुत्र“ या किसी और को परिभाषित करने की कोशिश नहीं कर रहा हूँ। यही मेरा उद्देश्य था। लेकिन यदि डॉक्टर साहब कहते हैं कि मुझे और नहीं बोलना चाहिए तो मैं रुक जाऊंगा।
डॉ. अम्बेडकर : मैं केवल इतना कह रहा था कि हम इस पर बाद में चर्चा कर सकते हैं।
उपाध्यक्ष महोदय : हम इस पर बाद में चर्चा कर सकते हैं।
सरदार हुकम सिंह : इसके बाद, महोदय, मैं निवेदन कर रहा था कि जहां तक पंजाब में प्रथा और रूढि़ का संबंध है, यह मान्यता प्राप्त और सुविख्यात हैं। आम आदमी और वकीलों तथा कानून निर्माताओं के इस बारे में सुविज्ञ होने के कारण यह हिंदू कानून पर अभिभावी रही हैं। जब यह इतने लम्बे समय से हिंदू कानून पर अभिभावी है, समय की कसौटी पर खरी उतरी हैं, न्यायिक निर्णयों और अन्य परीक्षणों की कसौटी पर खरी उतरी है तो कोई कारण नहीं कि इसे समाप्त किया जाए क्योंकि एक नए कानून की खोज की गई है और यह एक और कानून निर्याता द्वारा दिया जा रहा है। यह सुनिश्चित है। यह उपयुक्त है। यह समय की कसौटी पर खरी उतरी है और एक समान है। जैसा कि मैंने पहले ही निवेदन किया था कि इसका उल्लेख सार्वजनिक दस्तावेजों में किया गया है और इसकी तस्दीक आसानी से की जा सकती है। इसके बारे में कोई अस्पष्टता नहीं हो सकती। इसलिए मेरा निवेदन है कि इस खंड से “रूढि़ अथवा प्रथा“ शब्दों का लोप किया जाना चाहिए।
उपाध्यक्ष महोदय : पंडित ठाकुर दास भार्गव।
डॉ. अम्बेडकर : महोदय, यदि मैं निवेदन कर सकता हूँ तो मैं चाहूँगा कि सदन की अनुमति हो तो बैठक विसर्जित होने से पूर्व यह खंड सदन के समक्ष रखा जाए।
कुछ माननीय सदस्य : जी नहीं, जी, नहीं; यह बहुत ही विवादास्पद खंड है।
उपाध्यक्ष महोदय : मेरा विचार है कि हमें कल भी बैठना चाहिए। कल भी बैठक होगी।