510 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
जाएंगे। अगला ही सवाल उसने मुझसे पूछा कि ’क्या इसमें हमारी विवाह-विच्छेद प्रथा समाप्त कर दी जाएगी?’ ऐसा प्रश्न उसने मुझसे किया था। मैंने उससे कहा कि ”संभावना है कि विवाह-विच्छेद संबंधी प्रावधान पारित कर दिया जाएगा और जहां तक प्रथाओं का प्रश्न है केवल उन्ही प्रथाओं को मान्यता दी जाएगी जो विशेष परीक्षण पर खरी उतरती हैं और सभी प्रथाएँ जारी नहीं रहेंगी। इससे वह खुश नहीं था। वह चाहता था कि उसकी अपनी प्रथा को मान्यता दी जाए, चाहे वह उचित हो अथवा नहीं। महोदय, ऐसी ही बातें हैं जो अब लोगों के मानस में हैं। इसके साथ ही जहां तक इस सदन का संबंध है और जहां तक जनता के प्रतिनिधियों का संबंध है, हमें चिंता इस बात की है कि इस कानून में प्रथाएं एक निश्चित सीमा तक ही आनी चाहिए। हम चाहते हैं कि जो प्रथाएं लोगों के हृदय में गहरे पैठ गई हैं, जारी रखी जानी चाहिए। जहां तक दक्षिण भारत का संबंध है, हम जानते हैं कि वहाँ पर कुछ संबंध एवं विवाह हैं जो उत्तर भारत में बहुत आपत्तिजनक माने जाते हैं, परन्तु दक्षिण भारत में उन्हें सही और उचित माना जाता है। उनमें हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए महोदय, इसी प्रकार भारत के दूसरे भागों में कुछ प्रथाएं एवं सुस्थापित पद्धतियां हैं और कोई नहीं कहेगा कि उनमें हस्तक्षेप किया जाना चाहिए। इस संबंध में मैं अपनी बात एक प्रथा के माध्यम से स्पष्ट करना चाहूँगा जो पंजाब के खेतिहर वर्गों में व्यापक रूप से प्रचलित है और जो प्रावधान हम यहां तैयार कर रहे हैं, उनमें से कुछ वहां गड़बड़ी पैदा कर देंगे। एक विवाह वहां होता है जिसे करेवा विवाह कहा जाता है। किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाने पर उसकी विधवा का विवाह उसके छोटे भाई जैसा हो, चाहे यह भाई आयु में उस महिला के बराबर या उससे छोटा हो उससे कर दिया जाता है। कुछेक तबकों में उसका विवाह बडे़ भाई से भी कर दिया जाता है, परन्तु और तबकों में यह पद्धति प्रचलित नहीं है। अब इस किस्म के विवाह में सामान्य वैवाहिक रस्में, “सप्तपद“ आदि नहीं होती हैं। कुछ पारंपरिक रस्में निभा ली जाती हैं और विवाह सम्पन्न मान लिया जाता है। इस पद्धति का अंतिम परिणाम यह होता है कि न तो सम्पत्ति और न ही वह स्त्री परिवार से बाहर जाती है और पिछले पति से हुए बच्चों की देखभाल भी उचित तरीके से होती है। इन लोगों के बीच यह प्रथा प्राचीन समय से प्रचलित है। विधवा विवाह की यह प्रथा अब सवर्ण हिंदू भी धीरे-धीरे अपना रहे हैं। पंजाब के किसानों में प्रचलित विधवा पुनर्विवाह की यह प्रथा अब सवर्ण हिंदू भी अपना रहे हैं। इसलिए अब प्रथा यह है कि यदि मृतक के छोटे भाई की पत्नी जीवित भी हो तो भी उसे अपने बडे़ भाई की विधवा से विवाह करना पडे़गा और वे पति-पत्नी की तरह रहेंगे। हिंदू कोड के अनुसार यह द्विविवाह का मामला है।