514 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
* हिंदू संहिताः जारी
* पंडित ठाकुर दास भार्गव : महोदय, एक माननीय सदस्य ने इच्छा प्रकट की है कि मैं हिन्दी में बोलूँ। उनकी इस इच्छा को स्वीकारते हुए मैं इसी भाषा के माध्यम से अपने विचार प्रकट करना चाहूँगा।
जैसा कि मैंने कल सदन के समक्ष प्रस्तुत किया था कि हमारे रीति-रिवाज अत्यधिक भिन्न प्रकृति के हैं। इन रीति-रिवाजों में इतनी अधिक असमानता है कि देश के एक हिस्से में जिस रिवाज को अच्छा माना जाता है, वहीं दूसरी ओर दूसरे प्रांत में उसे बहुत निन्दनीय कृत्य कहा जाता है। इसलिए हमें इस विधेयक को सावधानी से प्रस्तुत करना होगा। कल मैंने ‘करेवा’ प्रकार के विवाह के बारे में बताया था जिस पर कुछ माननीय सदस्य हँस पड़े थे। यह रिवाज पंजाब व अवध में बहुत प्रचलित है और यह हँसी में उड़ाने की बात नहीं है। यदि आप हिंदू समाज के उच्च आदर्शों के अनुसार इस पर विचार करेंगे तो उस दृष्टि से संभव है कि कुछ माननीय सदस्यों को यह सही नहीं लगेगा क्योंकि प्राचीन मान्यताओं के अनुसार बड़े भाई की पत्नी माँ तुल्य मानी जाती है। रामायण के अनुसार लक्ष्मण की माँ ने अपने पुत्र को राम के साथ वनवास जाने की आज्ञा देते समय कहा था कि-
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‘‘रामम् दशरथम् विदिधी, मम् विद्धि जनकात्मजम्;
उन्होंने लक्षमण को कहा था कि वह राम को अपना पिता एवं सीता को उनके समान अर्थात् अपनी माता की दृष्टि से देखे तथा वन को अयोध्या समझे। यह हमारे समाज के उच्च आदर्श थे। कितने युवक अपने पिता के आदेशों पर वनवास पर जाने के लिए तैयार हैं? कितने व्यक्ति अपने बड़े भाई को अपने पिता तुल्य सम्मान देते हैं? यह व्यवहार एक आदर्श है। जहाँ तक समाज में प्रचलित रीति-रिवाजों का संबंध है, यहाँ तक कि हमारे शास्त्रों ने भी पति के छोटे भाई को दूसरा भावी पति ‘द्विवर’ (देवर) होने का विधान बनाया है। बहुत से मामलों में शास्त्रों द्वारा व्यक्ति को अपने बड़े भाइयों की मृत्यु के पश्चात् उनकी विधवा पत्नियों से विवाह करने की अनुमति दी गई है। इसमें आश्चर्यचकित होने जैसी कोई बात नहीं है। मैं मद्रास तथा अन्य राज्यों में प्रचलित रिवाजों से परिचित हूँ। मैंने आयु स्वीकृति समिति के सदस्य के रूप में संपूर्ण भारत का दौरा किया और विभिन्न रस्म-रिवाजों का अध्ययन किया। इसीलिए मैं कहता हूँ कि हमारे यहाँ भिन्न-भिन्न प्रकार के रीति-रिवाज हैं और मुझे इनकी गूढ़ता में अधिक गहराई तक जाने की आवश्यकता नहीं है। किसी भी व्यक्ति को किसी भी
’संसदीय वाद-विवाद, खंड XV भाग II, 22 सितंबर, 1951, पृष्ठ 3072-82