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मजहब की उन भावनाओं की जाँच-पड़ताल नहीं करनी चाहिए। मैं कहना चाहता हूँ कि विवाह की इस करेवा प्रथा पर हँसने का कोई कारण नहीं है। वास्तव में इस प्रथा की अच्छाइयाँ बहुत हैं और जिन समुदायों ने सदियों से इस प्रथा को अपनाया हुआ है उन्होंने इससे अत्यधिक लाभ उठाया है। उदाहरण के लिए, भारत में प्राचीन समय में बल्कि अभी भी, जब भी एक कन्या का परिवार विशेष में विवाह कर दिया जाता है तो, वह उस परिवार का सदस्य बन जाती है जबकि विवाह केवल एक ही व्यक्ति से होता है। जायदाद का जो भी हिस्सा उसे मिलता है, वह पूरे परिवार की संपत्ति का ही भाग होता है। उस संपत्ति के अलावा और स्त्री के हिस्से को परिवार में ही रखने के पूर्ण प्रयास किए जाते हैं और उसके पति की मृत्यु, के पश्चात् उसके बच्चों के पालन-पोषण का उत्तरदायित्व समूचे परिवार का हो जाता है। यह - करेवा’ प्रथा का मूल आधार है। इस प्रथा को अपनाते हुए, उस विधवा के पति के छोटे भाई अथवा उसके चचेरे भाई से उसका विवाह हो जाने के पश्चात् वह अपने पहले पति के देहांत के बाद भी उसी परिवार का सदस्य बनी रहती है। इस प्रकार से उसके पूर्व पति से उत्पन्न बच्चों का समुचित प्यार से लालन-पालन होता रहता है तथा किसी भी तरह से कोई कठिनाई नहीं आती है। माननीय सदस्य इससे अवगत हैं कि भारत में इस प्रचलित रिवाज को मान्यता प्राप्त है। विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1856 की धारा 2 के अनुसार, यदि एक विधवा स्त्री पुनर्विवाह करती है तो उसके अपने पति की सम्पत्ति के सारे अधिकार समाप्त हो जाते हैं। मैं आप सबका विशेषकर, माननीय डॉ. अम्बेडकर का ध्यान इस तथ्य की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ कि एक विधवा स्त्री द्वारा पुनर्विवाह किए जाने के पश्चात् उसके भरण-पोषण का खर्च अथवा उसके पूर्व पति की सम्पत्ति पर से उसके सभी अधिकार समाप्त हो जाते हैं। इसका कारण है कि दूसरे विवाह के पश्चात् वह स्त्री अब दूसरे परिवार का सदस्य बन जाती है। परन्तु करेवा प्रथा अर्थात् मृतक पति के भाई से विवाह होने के पश्चात् उसके पूर्व पति की सम्पत्ति पर भी उसका अधिकार यथावत् रहता है। यह प्रथा पंजाब में जाट सिख समुदाय में बहुतायत से विद्यमान है। जब एक विधवा अपने पति की मृत्यु के पश्चात् उसके छोटे भाई से पुनः विवाह कर उसी परिवार का पूर्ववत् सदस्य बनी रहती है, तो उसका भूमि पर अधिकार समाप्त नहीं होता है।
विधि मंत्री (डॉ. अम्बेडकर) : क्या यह उस समय अधिक उचित नहीं होगा
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जब हम विवाह की धारा पर विचार-विमर्श करेंगे? अभी हम लोग सामान्य रूप से विचार-विमर्श कर रहे हैं। मैं कह चुका हूँ कि जब भी कोई धारा आती है, तब यह आवश्यक होगा कि किसी भी सीमा तक प्रचलित रीति-रिवाजों के अनुसार वह धारा बनाई जाए। मैं अपने मित्र को केवल यही सुझाव देना चाहूँगा कि सम्भवतः उनकी यह टिप्पणी उस समय अधिक तर्क-संगत लगेगी जब हम उस भाग पर आयेंगे।