38 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
प्रस्तावित हो चुके हैं, यह पता करना बहुत कठिन है कि कौन-सा परिवर्तन, वास्तव में सही है। यह जानना बहुत कठिन है कि वास्तव में हम कहाँ पर हैं। मैं नहीं जानता संहिता के मूल प्रावधानों में जो प्रवर समिति द्वारा बना था, क्या दोष हैं। उसके शब्द इस प्रकार हैंः-
‘‘2. (क) यह संहिता सभी हिंदुओं पर लागू होती है, कहने का तात्पर्य, सभी व्यक्ति जो हिंदू धर्म को उसके किसी भी रूप या परिवर्तन को मानते हैं।’’
डॉ. अम्बेडकर ने अपने संशोधन में इन शब्दों के स्थान पर विकल्प ‘‘व्यक्ति जो धर्म से हिंदू हैं’’, दिया है। मुझे दोनों शब्दों में कोई अन्तर नहीं दिखलाई देता। शब्दों ‘‘सभी हिंदुओं,’’ का मतलब सभी व्यक्ति जो, ‘‘धर्म से हिंदू’’ हैं। इस प्रकार संहिता हर व्यक्ति जो अपने को हिंदू कहता है, लागू होती है। अब इन शब्दों को बदलने को कहा गया है। इसका कोई कारण नहीं बताया गया कि वे इन्हें नए शब्दों से क्यों बदल रहे हैं। अगर वास्तव में इन्हें हटा दिया जाए, और अगर डॉ. अम्बेडकर सदन को इन शब्दों को हटाने के लिए विवश करें, मैं सोचता हूँ एक बहुत ही वास्तविक कठिनाई हो सकती है। अगर आप ‘‘मानते’’ हटा दें आप इसकी परिभाषा कैसे देंगे कि कौन हिंदू है और कौन हिंदू नहीं है। प्रस्तावित शब्द है, ‘‘सब व्यक्ति जो धर्म से हिंदू हैं।’’ लेकिन हम कैसे जानते हैं कि कौन धर्म से हिंदू है और कौन नहीं है? क्या यह प्रस्ताव किया गया है कि हर व्यक्ति को घोषणा करनी होगी? मैं नहीं जानता कि क्या कार्य विधि सुझाई गई है और कैसे यह तय किया जाएगा कि अमुख व्यक्ति हिंदू है या नहीं। मैं कहूँगा कि मूल संहिता में शब्दों का उद्गम समिति के समय परीक्षण पर हुआ है। जहाँ तक मेरा ध्यान जाता है ये मुल्ला के ‘‘हिंदू संहिता’’ में भी है और ये शब्द बहुत प्राचीन समय में भी प्रयोग किए गए हैं। इन्हें एक लम्बे समय से मान्यता मिली है।
मेरी राय में इस दृष्टि से संशोधन की कोई आवश्यकता नहीं है और मेरा सुझाव है कि इसे सहमति नहीं दी जानी चाहिए। मैं माननीय मित्र श्री सरवटे द्वारा प्रस्तावित संशोधन का अनुमोदन इस आधार पर करता हूँ कि अगर हम इसे स्वीकार करें तो हम संविधान की विचारधारा के अनुसार कार्य करेंगे। अन्यथा जैसा कि मैंने संकेत दिया है संवैधानिक कठिनाई की दृष्टि से हमारे सभी प्रयास बेकार होंगे।
श्री श्यामनन्दन सहाय (बिहार) : क्या मैं इस विषय में एक सुझाव दे सकता हूँ?
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रचनाकारों द्वारा औपचारिक रूप से बहुत सारे संशोधन प्रस्तुत किए गए हैं लेकिन प्रस्तुतकर्ताओं ने अपने विचारों को स्पष्ट करने के लिए कोई भाषण नहीं दिए। इसी तरह का एक संशोधन स्वयं माननीय विधि मंत्री द्वारा भी दिया गया। हमें इस खंड में कोई संशोधन नहीं दिया गया और ‘उदारता’ से सरकार का दृष्टिकोण और दूसरे