खंड 2 : (संहिता का प्रयोग) - Page 54

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संशोधनों के प्रस्तुतकर्ताओं के दृष्टिकोणों को सुनना चाहिए जिससे कि हम चर्चा में भाग ले सकें या ऐसी परिस्थितियों में क्या करें, निर्णय कर सकें। इसलिए मेरा सुझाव है कि संशोधनों के प्रस्तुतकर्ता पहले अपने भाषण दें उसके पश्चात् खुले रूप से चर्चा हो। इससे चर्चा तथा निर्णय में सहायता होगी। कुछ भी हो हम पहले माननीय विधि मंत्री का दृष्टिकोण उनके संशोधन के बारे में सुनेंगे जिससे कि हम उनका समर्थन या विरोध कर सकें।

माननीय अध्यक्ष महोदय : मैं संशोधनकर्त्ताओं को बारी-बारी से बुलाने की सोच रहा हूँ, लेकिन मुझे लगता है कि प्रस्तुतकर्त्ता बहुत उत्सुक नहीं दिखाई देते जब कि दूसरों की तरफ अधिक जाती है। इसलिए मैं दूसरों को बुलाना चाहता हूँ।

डॉ. अम्बेडकर : प्रस्तुतकर्त्ताओं को एक धक्का लगा है। वास्तव में मैं स्वयं उनको सुनने की प्रतीक्षा कर रहा हूँ।

माननीय अध्यक्ष महोदय : माननीय विधि मंत्री अपना समय चुनने के लिए स्वतंत्र हैं। लेकिन मैंने उनको अब ही बुलाया था क्योंकि मैंने सोचा कि अगर वे थोड़ा देर से भाग लें तो हो सकता है रास्ता साफ मिले।

डॉ. अम्बेडकर : मैं किसी भी समय बोल सकता हूँ।

माननीय अध्यक्ष : उन्हें दो भाषण देने का हक है : कहने का मतलब है कि हो सकता है अगर वे चर्चा में अभी भाग लें तो वे जवाब देने के अधिकारी होंगे।

श्री श्यामनन्दन सहाय : वे खंड पर हुए साधारण चर्चा का प्रतिउत्तर दे सकते हैं, लेकिन जहाँ तक उनके अपने संशोधन हैं उन्हें सदन को आश्वस्त करना चाहिए कि सरकार की तरफ से संशोधन लाने के कुछ कारण हैं।

माननीय अध्यक्ष : मेरे विचार से उनकी स्थिति थोड़ी भिन्न है। उन्हें दूसरे जो कहते हैं उस पर भी विचार करना है और तब वह विचार ज्यादा अच्छी तरह स्पष्ट कर सकेंगे।

सरदार हुकमसिंह : मैं नहीं जानता मेरे दिमाग में यह कैसे आया कि संशोधन प्रस्तुत करने वाले अपने संशोधन पर नहीं बोलना चाहते।

माननीय अध्यक्ष : मैंने यह कभी नहीं कहा कि ‘वे बोलना नहीं चाहते’ मैंने कहा कि वे मेरी दृष्टि में सामने नहीं आए।’ इसी बीच डॉ. देशमुख उठे और मैंने उन्हें बोलने के लिए बुला लिया। बहुत से माननीय सदस्य : उठे।

माननीय अध्यक्ष : मैं नहीं जानता कि व्यक्तिगत कारणों से इस समय पंडित भार्गव को मुझे बुलाना चाहिए, श्री झुनझुनवाला।