516 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
माननीय उपाध्यक्ष : मैं भी यही सोच रहा हूँ। उन्होंने जिन संशोधनों का प्रस्ताव रखा है उससे पता लगता है कि विधेयक का केवल वह भाग जो रीति-रिवाजों के साथ संगत है, वही रहना चाहिए। तब वे कुछ रिवाजों को बचाना चाहते हैं। जहाँ तक कि इन रिवाजों का संबंध है- जिन्हें बचाया जाना है, उनका विशेषतौर पर उस समय उल्लेख किया जाना चाहिए जब हम विवाह एवं तलाक के संगत भाग पर विचार करेंगे। इस सामान्य प्रश्न के संदर्भ में कि क्या इसे वहाँ लागू करना चाहिए जहाँ पर असंगति है अथवा इसे सामान्यतः वहाँ लागू किया जाए जहाँ पर भी इस विषय पर विचार किया जा रहा हो, जब हम विस्तृत प्रकार से चर्चा करेंगे, इस विषय को तभी प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
डॉ. अम्बेडकर : क्या इसमें बहुत अधिक अंतर होगा मान लो हम कहते हैं कि कोई भी प्रथा जो कि संगत नहीं है वह विश्वसनीय होगी अथवा हम कहें कि ‘‘बशर्तें कि’’, मेरे विचार में दोनों ही बातों से समान प्रभाव पड़ेगा।
माननीय उपाध्यक्ष : माननीय सदस्य को रीति-रिवाजों में विस्तार से जाने की आवश्यकता नहीं है। प्रथाओं का सामान्य वर्णन ही बहुत है। हम इन पर विस्तारपूर्वक तभी चर्चा करेंगे जब यह धारा आयेगी।
पंडित ठाकुर दास भार्गव : मैं डॉ. अम्बेडकर द्वारा उठाई गई आपत्ति को समझता हूँ।
डॉ. अम्बेडकर : मैंने आपत्ति नहीं की है। मैं केवल यही कहना चाहता हूँ कि यह अन्य संदर्भ में अधिक प्रासंगिक रहेगा।
पं. ठाकुर दास भार्गव : मैं किसी भी रीति-रिवाज का अधिक विस्तार से वर्णन नहीं करूँगा। जैसा कि माननीय उपाध्यक्ष महोदय ने कहा है कि मेरे बताए गए सभी चार संशोधन एक-दूसरे के विपरीत हैं। इनमें से एक है कि रीति-रिवाज को सभी कानूनों से ऊपर होना चाहिए यहाँ तक कि ‘हिंदू संहिता विधेयक’ पर भी हावी होना चाहिए। मैंने इस सदन पर, प्रभाव डालने के लिए हमारी प्रथाओं में से एक उदाहरण देते हुए बताया था कि यदि इस संशोधन के मूल सिद्धांत को स्वीकार लेते हैं तो हम अपनी मान्यता को खो देते। मैं नहीं चाहता कि मेरे संशोधन का प्रस्ताव कि रिवाज को कानूनों पर हावी होना चाहिए, स्वीकार किया जाए। इसे हटा देना चाहिए। मैंने अपने रीति-रिवाजों के प्रकार बताने के लिए ‘करेवा’ प्रथा का उल्लेख किया था। ‘महोदय, मैं मानता हूँ कि मैं यह नहीं चाहता कि सदन इस रिवाज को अक्षुण्ण रखने का प्रयास करें, मैं उन रीति-रिवाजों का चलन बनाए रखने के लिए सदन पर जोर नहीं डालूँगा, जो मेरे विचार से उचित नहीं हैं।