हिंदू कोड-जारी - Page 532

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माननीय उपाध्यक्ष : क्या यह ‘सहिता’ के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध नहीं होगा।

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(इस संहिता का उद्देश्य विभिन्न रिवाजों को एक ही संहिता में समाहित करना है।) अभी तक, रिवाजों को संहिता-बद्ध नहीं किया गया है। कुछ रिवाजों को न्यायालय द्वारा समर्थन नहीं दिया गया है और यदि हम इससे अलग जायेंगे तो, पूरा कानून अस्पष्ट हो जायेगा। इस संहिता का उद्देश्य ही विफल हो जायेगा। मैं समझता हूँ कि ‘संहिता’, न्यायालय द्वारा बिना समर्थन प्राप्त रिवाजों को सम्मिलित करने का प्रयत्न करें और देश के समक्ष एक सामने लाने योग्य, दस्तावेज प्रस्तुत करें जो कि, आवश्यकता पड़ने पर आगे के लिए संशोधन करने का मूल आधार बन सके। परन्तु यदि सभी रिवाज विमुक्त कर दिए जाते हैं तो यह इस विधेयक की प्रकृति के विरुद्ध जायेगा। केवल विशेष मामलों में, रिवाजों से संबंधित विशेष प्रावधान बनाए जाने चाहिए। मैं माननीय सदस्य पर सीमा का अतिक्रमण करने के लिए नियंत्रण नहीं कर रहा हूँ अब चूँकि हमने इस सिद्धांत को स्वीकार कर लिया है कि हम कुछ विषयों को अवश्य सम्मिलित करेंगे, अर्थात् जो भी प्रथा इस कानून के लिए असंगत है, उसे निकाल देना होगा।

पं. ठाकुर दास भार्गव : मैं पूरे आदर के साथ निवेदन करता हूँ कि जो उपाध्यक्ष महोदय ने कहा है उसके प्रत्येक शब्द से मैं सहमत हूँ, क्योंकि यही सही है और जो टिप्पणी मैंने दी थी यह बात उसके अनुसार है। कुछ वर्षों से रूढि़वादी कानूनों तथा पंजाब के रिवाजों पर आधारित कानूनों पर निर्णय लिए गए हैं, वे निर्णय जो न्याय-अनुरूप, निष्पक्षता तथा सही विवेक से लिए गए हैं। हमारे रिवाजों के मुद्दे पर हजारों मुकदमे लड़े गए हैं। इसलिए हमें उन्हें आधार मानते हुए उन रिवाजों पर अमल करना चाहिए।

श्रीमान जैसा कि आपने कहा था कि यदि हम प्रत्येक रिवाज के विषय में आपत्ति उठाते गए तो हम अस्पष्ट स्थिति में पहुँच जायेंगे और फिर यह संहिता निरर्थक हो जायेगी। एक कदम आगे बढ़कर मैं यह निवेदन करना चाहूँगा कि हमें उन प्रचलित रिवाजों को, जो उचित प्रतीत होते हैं, अपवाद स्वरूप बना लेने चाहिए, जैसे ‘करेवा’ प्रथा का कुछ और समय के लिए प्रचलन में रहना चाहिए। मद्रास व बम्बई अधिनियमों में, यह प्रावधान है कि विवाह का प्रचलित विघटन, जहाँ भी यह रीति विद्यमान है, इसको चलने देना चाहिए। जहाँ भी ये रिवाज चल रहे हैं उन सब को या तो चलने देना चाहिए अथवा समाप्त कर देना चाहिए। कुरीतियों में सुधार लाने के लिए मैंने संहिताकरण करने का प्रयास किया है। माननीय डॉ. अम्बेडकर मुझसे सहमत नहीं हैं। वे सभी रिवाजों को संहिताबद्ध करना चाहते हैं। मैं पूर्ण ईमानदारी से दरख्वास्त करता हूँ कि रिवाजों को संहिताबद्ध करते समय हमें