हिंदू कोड-जारी - Page 533

518 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

केवल उनकी अच्छाइयों को ही ग्रहण करना है और कुरीतियों को छोड़ते जाना है। मैं ऐसे संहिताकरण के खिलाफ हूँ जिसमें कु-प्रथाओं को भी समाहित किया गया हो। संहिताकरण द्वारा हमारा उद्देश्य कु-प्रथाओं को कायम रखना नहीं है। अपने संशोधन द्वारा मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि, रिवाजों को कायम रहना चाहिए। मेरा यह भी प्रस्ताव है कि सार्वभौमिक कानूनों व सिद्धांतों को यथानुसार महत्वपूर्ण दर्जा देना चाहिए। यह निर्धारित करने के लिए छानबीन की जानी चाहिए कि क्या जरूरी है तथा सभी लाभप्रद और सार्वभौमिक कानूनों, लोकाचारों व रीति-रिवाजों को बनाए रखना चाहिए।

यदि हम अपने लोकाचार व रिवाजों को सुव्यवस्थित करना चाहते हैं, (मैं इस ओर इशारा करना चाहता हूँ कि हमारे सर्वाधिक महत्वपूर्ण रिवाज हैं कि हमें तलाक की अनुमति नहीं देनी चाहिए)। परन्तु हम अपनी स्त्रियों को तलाक लेने की स्वतंत्रता देने जा रहे हैं, क्योंकि ‘संविधान’ तथा न्याय-चेतना यह स्वीकृति नहीं देते हैं कि स्त्रियों को इस स्वतंत्रता से वंचित रखा जाए। आगे बढ़ो और उन्हें यह अधिकार दो परन्तु द्विविवाह एक प्रतिष्ठित प्रथा है।

सैकड़ों वर्षों तक यह प्रथा लोकप्रिय रही है और हमारे समाज के कुछ समुदायों में अभी भी प्रचलित है। इस विधेयक के स्वीकृत हो जाने के पश्चात् और एक पत्नी प्रथा लागू होने के उपरांत कोई भी व्यक्ति ‘करेवा’ प्रथा के अनुसार दूसरी स्त्री से विवाह नहीं कर सकेगा जब तक कि उसकी प्रथम पत्नी जीवित है।

माननीय उपाध्यक्ष : केवल यही एक बात है। जहाँ तक ‘करेवा’ प्रथा का संबंध है,

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यह परिस्थिति विशेष में द्विपत्नी प्रथा का अनुमोदन करती है। मैं समझता हूँ कि जब हम एक विवाह-प्रथा पर आयेंगे तब ही इस पर विचार-विमर्श करेंगे। पर सामान्य सिद्धांतों के ऊपर, माननीय सदस्य केवल इतना ही कह सकते हैं कि यह संहिता सभी पर लागू की जानी चाहिए केवल उनको छोड़कर जिनका उल्लेख इन्होंने जब-तब उदाहरण के तौर पर किया था कि इनको अधिनियम से मुक्त रखा जाए।

पं. ठाकुर दास भार्गव : मैंने किसी भी प्रथा विशेष के लिए नहीं कहा है। मैं

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केवल यही दिखाना चाहता हूँ कि इस संहिता में प्रथा का क्या स्थान है। केवल इसकी व्याख्या हेतु, मैंने उदाहरण का जिक्र किया था।

माननीय उपाध्यक्ष : मेरे विचार में, इस विधेयक के प्रस्तुतकर्ता का अनुभव है

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कि उसने सभी रीति-रिवाजों को देख लिया है और उसने सभी रीति-रिवाज इसमें सम्मिलित कर लिए हैं जैसे कि उसके अनुसार, कानून की स्वीकृति अवश्य होनी चाहिए। हमारे अन्य आदरणीय सदस्यगण अनुभव कर सकते हैं कि कुछ अन्य विशेष