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प्रकार की प्रथाएँ प्रचलन में हैं और विधेयक की संरचना में उनके अपवादस्वरूप आवश्यक रूप से बनाया व रखा जाना चाहिए। यदि ऐसा है तो, इसे समुचित चरण में किया जाएगा। वर्तमान समय में, हम सामान्य प्रावधान पर हैं जो कहता है कि कोई भी रिवाज जो अहितकर है और इसलिए इस संहिता का परस्पर-विरोधी है उसे हटाना होगा। क्या हमें ऐसा प्रावधान नहीं करना चाहिए जो कहे कि जहाँ तक इस संहिता से नियमित किए गए विषयों का संबंध है ऐसी प्रथा प्रचलित नहीं की जाएगी और दबाव नहीं डाला जायेगा? अतः इस धारा में क्या तर्क-संगत है - प्रथा की सामान्य प्रकृति और इधर-उधर के कुछ थोड़े से उदाहरण देना। यहाँ तक कि यदि कोई एक भी ऐसा रिवाज होगा जिसे इस विधेयक द्वारा रद्द किया गया हो तो ऐसी धारा आवश्यक है। अब हम विषय की गहराई तक जा रहे हैं। जैसे की क्या कोई रीति रिवाज एक समान, निरन्तर और प्राचीन प्रकृति का उपयोग कर रहा है, ये विषय ऐसे हैं जिन पर आवश्यक रूप से दृष्टिपात किया जाना चाहिए और माननीय सदस्यों द्वारा यदि कुछ सुझाव दिए जाते हैं तो उन पर भी विचार किया जाना चाहिए।
पं. ठाकुर दास भार्गव : यदि हम पूरी संहिता पर चर्चा कर रहे हैं तो यह धारा पूर्ण रूप से आवश्यक होनी चाहिए। परन्तु हम केवल एक अध्याय की बात कर रहे हैं जिसके प्रत्येक सोपान पर यह कहा गया है कि अमुक प्रथा इन-इन संदर्भों में लागू होगी। इसीलिए मैंने यह दिखाने के लिए कि ऐसा ही एक रिवाज सदियों से चला आ रहा है, उदाहरण का उल्लेख किया था।
माननीय उपाध्यक्ष : जहाँ तक यदि विवाह व तलाक से संबंधित एक भी अहितकर रिवाज है तो यह धारा आवश्यक है। दृष्टांत के लिए, इस विधेयक के प्रवर्तक अनुभव करते हैं कि जो भी अपवाद हैं चाहे वह एक मामा का अपनी भांजी से विवाह अर्थात् भाई का अपनी बहन की पुत्री से विवाह हो उसे विमुक्त नहीं किया जाना चाहिए।
डॉ. अम्बेडकर : उचित समय पर हम विषय पर चर्चा करेंगे।
माननीय उपाध्यक्ष : चलिए मान लेते हैं कि कानून मंत्री यह अनुभव करते हैं कि ऐसे रिवाज को कानून का बल प्राप्त नहीं होना चाहिए, तब हमारे पास एक सामान्य धारा होगी जैसी यह है। ऐसे भी रिवाज हैं, जो विवाह व तलाक से संबंधित हैं। यदि वे अहितकारी, सामाजिक नैतिकता अथवा लोकहित या लोक-नीति के विरुद्ध हैं तो, उनको इन अहितकारी रीतियों के विरोध में लागू करना चाहिए। मैं देख नहीं पा रहा हूँ कि आप इस प्रकार की सामान्य धारा से किस तरह और किस प्रकार निकल सकते हैं।