520 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
पं. ठाकुर दास भार्गव : श्रीमान् यदि आप सूची पर ध्यान दें तो पायेंगे कि धारा 4 को हटाने से संबंधित कोई संशोधन मैंने प्रस्तुत नहीं किया है। परन्तु मैंने इसका उल्लेख किया है और यह जानने के लिए एक उदाहरण भी दिया है कि इस सामान्य धारा में हम रिवाज को कहाँ तक स्वीकृति देंगे। मैं इस मायने से सहमत हूँ जब वे कहते हैं कि रिवाज निर्णय लेने का प्रथम नियम है।
माननीय उपाध्यक्ष : जहाँ तक धारा 4 का संबंध है, इस तर्क-वितर्क करने के लिए कोई प्रतिबंधित सीमा नहीं है।
पं. ठाकुर दास भार्गव : मैं निवेदन करना चाहता हूँ कि धारा 3 व 4, जिसमें रीति-रिवाजों को परिभाषित किया गया है, एक दूसरे से परस्पर व्याप्त हैं। कल, जब मैं धारा 3 पर चर्चा कर रहा था तो डॉ. अम्बेडकर ने प्रत्युत्तर में धारा 4 उद्धृत की थी। धारा 3 व 4 परस्पर व्याप्त हैं और किसी एक का उल्लेख करते ही विषय के आपसी संबंध के कारण दूसरी धारा का स्वतः ही उल्लेख आ जाता है। जैसा कि सूत्रों और स्मृतियों में कहा गया है-
‘‘वेदाः विभिन्ना‘ स्मृतियों विभिन्ना नैको मुनिर्यस्याः वाचा प्रमाणम्
धर्मस्याः तत्वन् निहितम गुह्यम् महाजनो येन गताः सा पन्था।’’
| g | kt |
|---|
(श्रुति कुछ कहती है और स्मृति कुछ और। ऐसा कोई ऋषि नहीं है जिसकी वाणी को अंतिम सत्य माना जा सके। धर्म [ कर्त्तव्य ] का रहस्य बहुत गहरा है। महान पुरुषों द्वारा ही इस मार्ग पर चला जा सकता है।)
मैं मानता हूँ कि रीति-रिवाजों का अपना एक विशेष स्थान है और बिना रीति-रिवाजों के किसी भी वैयक्तिक कानून का कोई अर्थ नहीं है जैसा कि पंजाब लॉ एक्ट, 1872 की धारा 5 का उदाहरण है। ऐसे बहुत से विनिर्णय हैं जो इस प्रभाव के कारण बने हैं कि रीति-रिवाजों का वैयक्तिक कानून में अपना एक स्थान है। मेरा सोचना है कि वैयक्तिक कानून बनाते समय हमें रीति-रिवाजों की उपस्थिति को स्वीकार करना होगा। श्रीमान्, पंजाब में, गत सौ वर्षों से कृषक समुदाय से संबंधित सभी मुकदमों को कृषि संबंधी ग्रामीण रिवाजों के अनुसार ही निपटाया जाना स्वीकार किया गया। शहरी दलों के बीच के मुकदमें में, यह मान लिया गया कि उसका वैयक्तिक कानून के अनुसार निपटान किया जायेगा। वास्तव में, पंजाब मुख्य न्यायालय को 1887 के 107, 1906 के 100 तथा अन्य निर्णयानुसार यह अब एक प्रकार का कानून बन गया है कि जहाँ पर मुकदमे के दोनों दल कृषक समुदाय से संबंध रखते हैं यहाँ तक कि किसी ऐसे मामले में जहाँ प्रथा विशेष के प्रमाण का दायित्व उसी व्यक्ति पर हो जिसने वह आरोप लगाया है, ऐसे अपवाद को छोड़कर