522 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
पति द्वारा मांगा जाता है तो विवाह-विच्छेद के पश्चात् पूर्व पत्नी के पुनर्विवाह होने तक उसके भरण-पोषण के लिए व्यय करने का पूर्ण उत्तरदायित्व पूर्व पति का होना चाहिए। विधेयक में, आप पायेंगे कि यद्यपि उनके लिए कोई रूढि़वादी आधार नहीं है तथापि विदेशों में प्रचलित नियमों के अनुसार बहुत से नियम बनाना सही पाया गया। अन्य देशों में लागू नियमों से हमारा कोई मनमुटाव नहीं है लेकिन मैं प्रत्येक रिवाज को इसमें शामिल करने के विरूद्ध हूँ क्योंकि बहुत से रिवाज प्रमाणहीन भी हैं। जबकि रूढि़वादी आधार का आधिपत्य अत्यधिक है, मैं तीन शब्दों-न्याय, समदृष्टि तथा उचित विवके को अनुपस्थित पाता हूँ। जो रिवाज अनैतिक हैं उन्हें उच्च न्यायालय द्वारा अन्यायपूर्ण ठहराते हुए रद्द कर दिया है। यदि अस्वीकृत रीति-रिवाजों के अनुसार दबाव डाल कर लिया गया तलाक का मामला सामने आता है और ऐसा प्रमाणित भी हो जाता है तो उच्च न्यायालय इसे अनैतिक करार देगा। हालांकि, ये रिवाज भी अन्य प्रथाओं के साथ-साथ ही विद्यमान हैं। लेकिन ऐसे बहुत से तथ्य हैं जो वास्तव में न्याय पर आधारित नहीं हैं और धारा 4 के अंतर्गत नैतिकता, पिछले दरवाजे से आना चाह रही है।
जो रीति-रिवाज ‘हिंदू संहिता’ की आत्मा को पूर्णतया दूर कर देंगे, उन्हें इसमें प्रवेशाज्ञा देने के प्रयास किए जा रहे हैं। हम किसी भी अवस्था में उन्हें स्वीकार नहीं करेंगे। हमें इन प्रयासों पर तुरन्त रोक लगानी होगी। मुझे उचित और उपयोगी प्रथाओं पर तथा उन प्रथाओं पर भी जिनकी जड़ें बहुत गहरी हैं, उन पर कोई आपत्ति नहीं है, उदाहरणस्वरूप, वह दक्षिण भारतीय रिवाज जिसका आपने अभी उल्लेख किया था मुझे आलियासंतान अधिनियम में, जो 24 (ए) में सम्मिलित किया गया है, कोई आपत्ति नहीं है। परन्तु जो रिवाज हानिकारक हैं उन्हें कोई स्थान नहीं दिया जाना चाहिए। हिंदू कानून कहता है कि रीति-रिवाज पुरातन समाज के लिए हैं लेकिन आधुनिक समाज के लिए, दुनिया की प्रगति को धीमा करते हैं, कुछ ऐसे सर्वविदित सिद्धांत हैं जिनको विधानसभा अधिनियमों की शक्ल में मूर्तरूप प्रदान करती है, वही सिद्धांत हमारे लिए भी मूल आधार होने चाहिए। इसीलिए मैं इस बात पर अधिक जोर डाल रहा हूँ कि रीति-रिवाजों को अनावश्यक रूप से आगे नहीं लाना चाहिए। तभी तो मेरे द्वारा प्रस्तुत किया गया संशोधन भी यही कहता है। मेरे संशोधन सं. 446 का उद्देश्य यही दर्शाना है कि यदि उस धारा को हम अपना लेते हैं तो हम एक दुर्गम परिस्थिति में अपने को पायेंगे। मैंने उस संशोधन को केवल चर्चा के लिए ही प्रस्तुत किया था न कि उसे अपनाने के लिए। शेष संशोधन मैं पहले ही प्रस्तुत कर चुका हूँ।
इन परिस्थितियों में मैं डॉ. अम्बेडकर एवं सदन से स्पष्ट रूप से अनुरोध करना चाहता हूँ कि पूर्ण न्याय किया जाना चाहिए और किसी को भी अनावश्यक रूप से