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कठिनाई में नहीं डालना चाहिए। माननीय सदस्य न्याय, समदृष्टि तथा सही विवेक के आधार पर जैसा चाहते हैं वैसा ही करें उनके समक्ष इस आधार पर चुनाव करने के लिए पूर्ण व्यापक क्षेत्र है। परन्तु जो भी नया विधान बनाया जाए उसे न्यायपूर्ण होना चाहिए। यह सही है कि रीति-रिवाजों का कानून बनाने में उचित स्थान होना चाहिए, परन्तु मूलभूत अधिकारों के विरूद्ध जा रहे रिवाजों को इनमें सम्मिलित नहीं किया जाना चाहिए। हम रिवाजों को उनका स्थान देना चाहते हैं। हम उनका आदर करना चाहते हैं, यदि वे रिवाज उन रूढि़वादी प्रथाओं के विरोधी हैं जो हमें अनैतिकता की ओर ले जाती हैं क्योंकि ऐसी प्रथा ‘हिंदू शास्त्रों’ एवं सिद्धांतों की विरोधी है। यह ठीक है कि विवाह-विच्छेद के प्रावधान के प्रतिवेदन पर ही भिन्नता है लेकिन मैं महिलाओं के लिए न्याय चाहता हूँ जो इन दिनों सबसे अधिक अन्याय का शिकार हो रही हैं। एक उनको ही सहारा देना चाहता हूँ। कवि तुलसीदास ने सीताजी के मुख से कहलवाया है किः
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मितम् द्दाति ही पिता मितम् भ्राता मितम् सुताः,
अर्थात गरीब स्त्री आर्थिक तौर पर पति पर निर्भर रहती है इसलिए वह पति की पूजा करती है। इसलिए यह न तो समाज के हित में है और न ही यह न्याय सिद्धांतों के अनुरूप है। तुलसीदास जी ने अच्छा ही है जो यह नहीं बताया कि श्री रामचंद्रजी व श्री तुलसीदास जी के लिए कैसा आदर देना चाहिए। मैं औरतों को और अधिक समय तक जंजीरों में जकड़े रखने देने के लिए तैयार नहीं हूँ। विवाह-विच्छेद का सिद्धांत व्यक्ति विशेष की इच्छा और बराबरी का दर्जा व न्याय पर आधारित है। महिलाओं के साथ हो रहे अन्याय को देख कर मैं अपनी आँखें बंद नहीं कर सकता हूँ। नवयुवक पतियों द्वारा अपनी पत्नियों को छोड़ देना प्रतिदिन का चलन हो गया है। मैं उनसे पूछना चाहता हूँ कि हमारी ये बहनें कहाँ जाएँ? इसलिए मेरा विश्वास है कि विवाह-विच्छेद एक उचित प्रावधान है। लोक ‘सती’ का संदर्भ ग्रहण करते हैं। पर क्या कोई पुरुष कभी सता हुआ है? वास्तव में, गुजरे समय में स्त्रियों को अपने अधिकारों से वंचित रखने का पूरी दुनिया में प्रचलन था। विवाहित स्त्री का संपत्ति अधिनियम इंग्लैंड में 1883 में पारित हुआ था। श्री टी. एन. सिंह : (उत्तर प्रदेश)
पं. ठाकुर दास भार्गव : क्या आप सता का अर्थ भी नहीं समझते हैं, सभी स्त्रियाँ ‘सती’ का अर्थ समझती हैं परन्तु कोई भी पुरुष ‘सती’ का अर्थ नहीं जानता है।
इसलिए मेरा निवेदन है कि प्रथाओं के, विशेषकर कु-प्रथाओं, के आधार पर