524 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
हमें कोई प्रावधान नहीं बनाने चाहिए। दूसरी ओर हमें रिवाजों को समाप्त करने का साहस दिखाना चाहिए- ऐसे पुराने रूढि़वादी रिवाज जो अब बेकार हो गए हैं। सरकार को न्याय व समानता पर आधारित विधान बनाने चाहिए।
श्री भट्ट : महोदय, मेरा एक संशोधन गलती से मुझसे छूट गया था। यदि आज्ञा प्रदान करें तो मैं उसे अब प्रस्तुत करूँ।
माननीय उपाध्यक्ष : क्या यह पहले से ही सूचीबद्ध है? क्या नम्बर है?
श्री भट्ट : सूची नं. 5 में नं. 288।
माननीय उपाध्यक्ष : कल इसे क्यों नहीं प्रस्तुत किया गया था?
श्री भट्ट : मैं उचित समय पर प्रस्तुत नहीं हो सका था। जब मैंने सदन में प्रवेश किया तो वार्त्ता आरम्भ हो चुकी थी।
माननीय उपाध्यक्ष : वे प्रस्तुत कर सकते हैं।
श्री भट्ट : मेरा प्रस्ताव है कि माननीय डॉ. अम्बेडकर द्वारा प्रस्तुत संशोधन में नई प्रस्तावित धारा 4 में-
( i ) भाग (क) में ‘‘इस संहिता में किया गया’’ के बाद ‘‘इस संहिता के लागू होने ( i
के 10 वर्ष पश्चात्’’ को सम्मिलित करें; तथा
( ii ) भाग (ख) के पश्चात् यह परिभाषा जोड़ें :
‘‘परिभाषा- इस संहिता के लागू होने के 10 वर्ष तक के लिए उप-धारा (क) में दिए गए किसी भी रीति-रिवाज के होते हुए भी, विद्यमान संदर्भ नियम अथवा प्रचलित किसी भी प्रथा, का प्रभाव पड़ सकता है।’’
* बाबू रामनारायण सिंह (बिहार) : श्रीमान् आज आपने मुझे बहुत पहले ही इस
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खतरनाक विषय पर बोलने का मौका दिया, जिसके लिए मैं आपका शुक्रिया अदा करता हूँ। कल तथा परसों भी मैंने इस विषय पर आपकी ओर कई बार देखा था परंतु जैसा यह विषय महतवपूर्ण था, आपने मेरी ओर आँख उठाकर नहीं देखा जिससे मुझे बोलने का मौका नहीं मिल पाया था। इस संबंध में क्या मैं अपनी धारणा प्रकट कर सकता हूँ कि इसमें कोई शक नहीं है कि आप अपनी स्थिति में पूर्ण न्याय करें जिससे किसी को भी कोई संदेह नहीं रहेगा....
* संसदीय वाद-विवाद, खंड XV भाग II, 22 सितंबर, 1951, पृष्ठ 3095-3112