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श्री श्यानंदन सहाय (बिहार) : नहीं किसी को भी नहीं।
बाबू रामनारायण सिंह : और वास्तव में, किसी को नहीं है, परन्तु आप को संतुलित हाथ से अपने आदेश देने चाहिए। कल आपको यह सूचित करते हुए हर्ष हो रहा था कि आपके विरुद्ध कुछ भाव उठ रहे हैं और आप चाहते हैं कि ऐसे भाव नहीं होने चाहिए, ताकि कार्य करते समय सामान्य रूप से संतोष प्राप्त हो सके। ऐसा है परन्तु श्रीमान्, यह ध्यान रखें कि सब कुछ विवेकपूर्ण तरीके से किया जाना चाहिए। लेकिन कोई यदि यह सोचकर परेशान रहे कि लोग उसे सदैव भ्रमवश आदर देंगे, तो उससे संभाव्यतः कुछ गलतियाँ हो सकती हैं। इसलिए मेरा आपसे निवेदन है कि अपना धर्म बुद्धिमत्तापूर्ण निभाएँ जैसा आप करते आ रहे हैं। आपको इस दबाव में कार्य नहीं करना चाहिए कि लोग सोच रहे होंगे आप उचित प्रकार से कार्य नहीं निपटा रहे हैं।
श्री जांगड़े (मध्य प्रदेश) : कृपया विषय की बात कीजिए।
बाबू रामनारायण सिंह : मैं एक बात और कहना चाहूँगा। जब मैं बोलने के लिए
खड़ा हुआ था, आपने, यह जानते हुए कि किसी भी सदस्य ने अपने विचार प्रकट नहीं किए यह घोषणा कर दी कि विषय पर पर्याप्त चर्चा हो चुकी है और अब इस प्रश्न का निर्धारण ही किया जाना है। तो भी मैं आपका ध्यान इस सत्य की ओर दिलाना चाहता हूँ कि यह एक महत्वपूर्ण विषय है।
श्री जांगड़े : माननीय सदस्य को अब विषय पर आ जाना चाहिए।
माननीय उपाध्यक्ष : मैं कहना चाहूँगा कि इस बात का निर्धारण किसी अन्य पर छोड़ दिया जाए कि बहस पर्याप्त हुई है अथवा नहीं, और अध्यक्ष महोदय को इसका उत्तरदायित्व दिया जाए। मैंने माननीय कानून मंत्री को इसका प्रत्युत्तर देने के लिए बुलाया है। अध्यक्ष पर जब निर्णय लेने का भार सौंप दिया गया है तो उन सभी विनिर्णयों का उल्लेख करना उचित नहीं है। मैंने अभी माननीय सदस्य को बोलने का अवसर दिया था। यह परिभाषित धारा पर था। यह धारा 4 है। यदि वे उस पर कुछ कहना चाहते हैं तो उन्हें कहने दिया जाए। यह कहना कि ‘तब आपने मुझे कोई अवसर नहीं दिया था’ क्या ठीक है? यह युक्तिसंगत नहीं।
बाबू रामनारायण सिंह : श्रीमान् जो भी आपके विनिर्णय सब मान्य हैं। लेकिन मैं कुछ भी अनुचित नहीं कह रहा हूँ।
माननीय उपाध्यक्ष : उस विषय पर समय व्यर्थ करना क्या सही है?
बाबू रामनारायण सिंह : वह बात नहीं है। यहाँ उपस्थित सभी सदस्यों को