526 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
बोलने का अधिकार है, और जिस विषय पर यहाँ चर्चा की जा रही है उसे इस तरह प्रकट नहीं किया जाना चाहिए था। मै समझता हूँ कि वास्तव में सरकार ने ये उपाय सुझाए हैं और उसे तथा उनके सहायकों को दिया गया दण्ड यथोचित है। श्रीमान्, आप शायद यह नहीं जानते हैं कि यहाँ बाहर प्रतिदिन सैकड़ों व्यक्ति गिरफ्तार किए जाते हैं और उन्हें दस-बीस मील दूर ले जा कर छोड़ा जाता है। इसे एक धर्मनिरपेक्ष राज्य धर्मनिरपेक्षता की आड़ में सभी प्रकार के अविवेकी कार्यों को होने की स्वतंत्रता देता है? यह संसद नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा करने के लिए बनाई गई है और आप इसके अध्यक्ष हैं। ये सभी बातें आपकी जानकारी में रहनी चाहिए और आपको इन पर यथोचित ध्यान देना चाहिए।
आखिर यह क्या है कि पुलिस चारों ओर तैनात रहती है और कोई भी इसे पार नहीं कर सकता? यह बहुत ही गलत और पूर्णतः न्यायोचित नहीं है।
यह विधेयक ‘हिंदू कानून’ के सभी पूर्व पाठ और सभी नियम तथा उनसे संबंधित व्याख्या का निराकरण करता है। मैं रीति-रिवाजों की बात नहीं कर रहा हूँ। (मैं साधारण तौर पर विषय की बात कर रहा हूँ) श्रीमान्, आप एक विद्वान हैं और भली-भांति जानते हैं कि हमारे देश के वेद सृष्टि के आरंभ और सामाजिक संगठन की स्थापना के समयारंभ में ही प्रकट हो गए थे। व्यक्ति के आचरण के नियम तथा हमारे देश में ‘वेदों’ द्वारा ही निर्धारित किए गए हैं। आज हमारे पास पंडित नेहरू का प्रशासन है जिसके प्रतिनिधि डॉ. अम्बेडकर एक ही बार में उन सभी नियमों को रद्द करना चाहते हैं जो सृष्टि के आरम्भ से अस्तित्व में हैं। मैं कहना चाहता हूँ कि सभी सदस्य इस प्रकार के मूल्याँकन का विरोध करें। प्रथमतः, ‘हिंदू संहिता विधेयक’ को इस प्रकार पारित नहीं किया जाना चाहिए। यदि इस प्रस्ताव को पारित ही किया जाना है तो कम से कम धारा 4 के इस भाग को तो किसी भी तरह से पारित नहीं किया जाना चाहिए। महोदय, आप भी जानते हैं और डॉ. अम्बेडकर भी जानते हैं कि महात्मा बुद्ध द्वारा बौद्ध धर्म ‘वेदों’ का प्रभुत्व कम करने के लिए बनाया गया था। परन्तु वैदिक धर्म लुप्त नहीं हुआ। पंडित नेहरू के शासन के आगमन और डॉ. अम्बेडकर के कार्यालय में आने के मुश्किल से केवल कुछ ही वर्ष व्यतीत हुए होंगे और ‘वैदिक सिद्धांतों’ का खंडन भी किया जाने लगा। क्या वे यह नहीं सोचते हैं कि ऐसे कानूनों को पारित नहीं किया जाना चाहिए? इस देश में कोई भी ऐसे कानून को मान्यता नहीं देगा।
श्री श्यामनंदन सहाय : बाबू रामनारायण सिंह पूरे तौर पर सही हैं।
बाबू रामनारायण सिंह : वे यह कहने का साहस कैसे कर सकते हैं कि वे चीजें
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