हिंदू कोड-जारी - Page 542

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जो अतिप्राचीन समय से अस्तित्व में हैं, जबसे पृथ्वी का आरम्भ, सूर्य व चंद्र की रचना हुई, अब नहीं मानी जायेंगी? यह अधिकार उन्होंने कहाँ से प्राप्त किया? बौद्ध धर्म वैदिक धर्म को उखाड़ फेंकने के लिए बनाया गया था। इस्लाम को समाहित कर अन्य धर्म भी आए। सभी आए और अप्रचलित हो गए परन्तु ‘वैदिक-धर्म’ अपने स्थान पर ही रहा है और रहेगा। कोई उस का नाश नहीं कर सकता है और इसे मिटा देने का यह अनुचित व पूर्णतया दिशाहीन प्रयास है। इस प्रकार के प्रस्तावों को संसद में लाने से मुझे दर्द देता है। जैसा कि हमारे मित्र ठाकुर दास भार्गव ने अभी धर्म एवं अच्छे आचरण के ‘वेदों व स्मृतियों’ में निर्धारित नियमों के बारे में कहा था-

वेदा, स्मृति, सदाचाराः, आत्मान्स्तुष्तीरेवा च,

एताच्चतुर्विधाः प्रहुस -

सक्शादधर्मस्य लक्षणम्।

धर्म की परिभाषा चौगुनी है; वेद, स्मृति, सदाचार (सही आचरण) तथा आत्मतुष्टि (आत्म-संतोष)।

इस प्रकार वेदों के अनुसार ही सही आचरण के नियम निर्धारित किए गए थे। पर, केवल इतना ही ध्यान में लाना पर्याप्त नहीं था। यह भी देखना था कि वेदों ने क्या विनिर्धारित किया, जो निर्देश दिया वह शास्त्रों ने उसका अनुपूरण किया। परन्तु केवल यही उसका अंत नहीं था। ‘वेदों’ में दिए गए और ‘शास्त्रों’ द्वारा समर्थित, नियमों को सज्जन पुरुषों के आचरण, नीति और कार्यों के परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। सही आचरण के नियमों का यही अर्थ था। लेकिन उन्हें मानने के लिए कोई भी बाध्यता केवल इसलिए ही नहीं थी कि वे नियम वेदों और ‘धर्म शास्त्रों’ द्वारा सुझाए गए थे और सज्जन पुरुषों द्वारा भी अपनाए थे। और अंततः, स्वयं यह देखना कि उसकी चेतना, उसके भले-बुरे के ज्ञान से कितने सहमत हे। इन सभी कारकों पर विचार के पश्चात् ही उसका अंतिम रूप से कर्त्तव्य निर्धारित किया जाता था।

‘वेदों’, शास्त्रों और सही आचरण के बारे में बोलना; यहाँ तक कि सद्विवेक भी अछूता नहीं रहा; माननीय मंत्रीजी और यह सरकार समझती है कि हमारा विवेक हमें छोड़ दे और यह विधेयक पारित हो जाएः और कार्य इसके अनुसार हो जाएँ जरा सोचों, यह कितना बड़ा अन्याय है। क्या मुझे कुछ और कहने की आवश्यकता है, आप जरा शब्दकोश में ‘कानून’ शब्द का अर्थ देखिए। आखिर क्या अर्थ है इसका? आप