हिंदू कोड-जारी - Page 544

529 वेदाः विभिन्नाः स्मृतियाँ विभिन्नाः,

नायको मुनिऋषिया वाचा, प्रमाणम्,

धर्मस्याः तत्वम् निहितम् गुह्यम्,

महाजनो येन् गताः पंथा।

वेदों में भिन्नता है और स्मृतियों में भी अंतर है। ऐसा कोई संत नहीं है जिसकी वाणी को अंतिम सत्य जाना जा सके। ‘धर्म’ गूढ़ रहस्य है, महान आत्माओं द्वारा ही इसका अनुगमन किया गया है।

अर्थातॅ- एक ‘वेद’ एक उक्ति देता है जबकि दूसरा विचारों में अंतर दर्शाता है। ‘वेदों’ में बहुत-सी ऐसी बातें हैं जिन पर लोगों को शंका है। जैसे कि ‘स्मृति’ और ‘धर्मशास्त्र’ हैं। ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि सभी के एक से विचार हैं। कुछ ‘धर्मशास्त्र’ एक बात कहते हैं तो, दूसरे कुछ भिन्न बात कहते हैं। विचारों में भी मतैक्य नहीं है-़नायको मुनिऋषियाः वाचा प्रमाणम्- ‘‘ऐसा कोई भी संत नहीं है जिसकी वाणी को अंतिम सत्य माना जा सके’’, ऐसा कोई संत नहीं हुआ जिसकी उक्ति प्रामाणिक मानी जा सके, अतः उसे पूर्ण सत्य स्वीकार कर शेष को त्याग दिया जाए- ऐसा नहीं है। परन्तु इसके पश्चात् हममें से वे व्यक्ति जो मनु महाराज का उल्लेख करते हैं-उनमें से कुछ यही कह सकते हैं कि डॉ. अम्बेडकर आज के मनु हैं....

डॉ. अम्बेडकर : मैं इस नाम को स्वीकार नहीं करता हूँ।

बाबू रामनारायण सिंह : कृपया, स्वीकार न करें। उन्होंने ऐसा गलती से कहा है, क्योंकि, वास्तव में, आप इसके योग्य नहीं हैं; यह स्वीकारने योग्य बात ही नहीं है। जो लोग आपको यह नाम प्रदान कर रहे हैं वे आपकी चाटुकारिता कर रहे हैं। यदि आप को ‘मनु’ कहा जा रहा है, तो, हम सब भी ‘मनु’ कहलवाना चाहेंगे; आप अकेले ही क्यों।

और मनु के जो भी अधिदेश, आदेश थे वे स्वतः प्रत्येक व्यक्ति द्वारा अपना लिए गए थे। जब-जब भी वे कानून बनाने के लिए बैठे किसी भी सेना अथवा पुलिस ने चोकसी नहीं की। मैं यहां तक कहूँगा कि हमें यह अनुभव करते हुए शर्म आनी चाहिए कि जब ऐसे विषय पर चर्चा की जाती है तो हमारे चारों ओर पुलिस और सेना इसलिए पहरा दे रही होती है ताकि कोई बाहर से आकर यहां हस्तक्षेप न करे। और आगे, यह कहा गया हैः ‘‘धर्मस्य तत्वम् निहितम् गुह्यम्’’- ‘धर्म’ का रहस्य अत्यधिक गहरा है यह गुफाओं में छिपा हुआ है। महोदय, प्रत्येक व्यक्ति क्या जानता है कि समय-समय पर इन व्यक्तियों को यह विचार करना चाहिए कि ‘धर्म’ का विषय इतना कठिन था कि इसे समझा नहीं जा सकता था। इसका रहस्य,