532 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
की सनक है, जिन्हें सत्ता मिल गई है। वे हठधर्मिता से वशीभूत हो गए हैं और यह कहते हैं कि विधेयक को, कैसे भी हो, पारित हो जाना चाहिए। देश क्या सोचता है, उसकी क्या आवश्यकता है, सरकार इस संबंध में कभी परेशान नहीं होती है। इसके लिए, यहाँ पर क्या खर्च किया जाना चाहिए, आखिरकार, इसकी क्या आवश्यकता है, इस बारे में कौन ध्यान देता हैः सरकार प्रचुर धन खर्च करती है और इस तरह देश का विनाश करती है; लोगों की इच्छा के विपरीत अर्थहीन और व्यर्थ कानूनों को पारित करने जा रही है। मैं हमारे राजाजी और डॉ. अम्बेडकर से विधेयक वापिस लेने के लिए आग्रह करता हूँः देश को यह नहीं चाहिए, और देश का हित, हम सबका हित, इसको वापिस ले लेने में है। मुझे आश्चर्य होता है कि उस जगह ऐसा अन्यायपूर्ण कार्य हो रहा है जहाँ राजाजी जैसे व्यक्ति उपस्थित हैं। इससे अधिक शर्मनाक और दुखभरी बात और कोई नहीं हो सकती है।
मैं और समय नहीं लेना चाहता हूँ लेकिन मैं आपसे निवेदन करना चाहता हूँ कि यह विषय इतना अधिक गंभीर है कि इसके लिए एक यथोचित ‘बहस’ की आवश्यकता है; और यदि कोई भी आदरणीय सदस्य इस पर बोलना चाहते हैं तो उन्हें ऐसा करने के लिए अनुमति प्रदान कर देनी चाहिए। इस ‘विधेयक से पूरे देश के साथ ही, शहर में भी यह हलचल मच गई है कि इसे पारित नहीं किया जाना चाहिए। सरकार को इसे वापिस ले लेना चाहिए, और यदि इसे वापिस नहीं लिया जाता है तो इस पर उचित प्रकार से विचार-विमर्श होना चाहिए और माननीय सदस्यों को अपने विचार व्यक्त करने से रोकना नहीं चाहिए। मैं माननीय सदस्यों को अपने विचार व्यक्त करने से रोकना नहीं चाहिए। मैं माननीय सभी सदस्यों से अनुरोध करूँगा कि वे इसके सभी गुण-दोषों के पहलुओं को समझने के बाद ही इसको स्वीकृति दें। यह भी दिमाग में रखना चाहिए कि देश और समाज के हितों को इस स्वेच्छाचारी विधेयक द्वारा किसी भी दशा में क्षति न पहुँचे, और सभी माननीय सदस्यों से मैं पुनः सविनय निवेदन करता हूँ कि कम से कम इस धारा को तो हटा ही दें।
श्री सरवटे (मध्य भारत) : मैं डॉ. अम्बेडकर के संशोधन के विरोध में खड़ा हूँ क्योंकि मेरे विचार में संशोधन का भाग (ख) अनावश्यक और व्यर्थ है जबकि भाग (क) पूर्ण रूप से अवांछनीय है।
डॉ. अम्बेडकर : आप मुझे आपको दिए गए समय में जितना भला-बुरा कहना चाहें कहें पर आप अधिक समय नहीं ले सकते हैं। मुझे आरोपों से अधिक समय-सीमा का ध्यान रखना है।
* श्री सरवटे (मध्य भारत) : श्रीमान, मैं उन को भला बुरा नहीं कह रहा हूँ उनके