533
संशोधन का विरोध कर रहा हूँ। यदि बीच में टोका न जाए तो, मैं बहुत ही कम समय लूँगा।
मैं निवेदन करता हूँ कि संविधान के अनुच्छेद 254 के आधार पर राज्य द्वारा बनाए गए सभी कानून, जो कि संसद द्वारा स्वतः बनाए गए कानूनों के प्रतिकूल या परस्पर विरोधी बैठते हैं, स्वतः ही अमान्य या अप्रवृत्त हो जाते हैं। अन्य कानून जो संभावित रूप से इस संबंध में उल्लिखित किए जाने चाहिए वे केन्द्र द्वारा उस संहिता से पूर्व बने कानून हों। उनके संबंध में बाद का कानून पिछले कानून से पूर्व आयेगा। इसलिए दोनों मामलों में; केन्द्र द्वारा बनाए गए कानूनों के मामले में, उन्हें, उस सीमा तक, जहाँ वे संहिता से विरोध प्रकट करते हैं, अमान्य माना जाएगा।
इसलिए, मेरा कहना है कि भाग (ख) अनावश्यक एवं व्यर्थ है जहाँ तक भाग (क) का संबंध है, इस संशोधन का प्रभाव यह पड़ेगा कि हिंदू कानून तथा प्रथाओं के सभी रीति-रिवाज, सभी ग्रंथ या नियम अथवा व्याख्या, प्रारंभ की उस धारा को छोड़ते हुए, अमान्य हो जाएंगी जिसमें ऐसे सभी रीति-रिवाज जो बाद के प्रावधानों में सम्मिलित कर लिए गए होंगे, बचा लिए जायेंगे। मेरा निवेदन है कि यह पूर्णतः अवांछनीय है। हिंदू धर्म चल रहा है और प्रगति पर है। यह कहा गया है कि यह लुप्त और मृतप्रायः हो गया है। इसकी तुलना उस कायर सैनिक से की गई है जो लड़ाई के मैदान को छोड़ कर भाग खड़ा हुआ है। मैं केवल यही निवेदन करना चाहूँगा कि अक्सर यह ध्यान नहीं दिया जाता है कि जो लड़ाई से भाग खड़ा हुआ है वह केवल तभी आयेगा जब विजेता दुश्मनों को परास्त कर देगा। यह सदैव याद रखना चाहिए कि हिंदुओं ने, उनको, जिन्होंने कुछ समय के लिए, और केवल अस्थायी समय के लिए उन पर प्रभुत्व पा लिया, मार भगाया है। पिछली शताब्दी में महाराष्ट्र में जहां के डॉ. अम्बेडकर स्वयं हैं, मराठा और तब उत्तर में सिख अपनी स्वतंत्रता प्राप्त करने व राज्य स्थापित करने में सफल रहे। परन्तु मैं प्राचीनतम अथवा आधुनिक इतिहास को दोहराने की आवश्यकता नहीं समझता हूँ। हमारे अपने समय में अथवा उससे पूर्व यह पूरा होते देखा है। क्या हम भूल गए हैं कि वर्तमान संसद, जिसके डॉ. अम्बेडकर एक उदाहरण हैं किसके फलस्वरूप हैं....
डॉ. अम्बेडकर : मुझे यहाँ होने का कोई अधिकार नहीं हैं मुझे यहाँ से आँख
| csMd | j |
|---|
बचा कर भाग जाना चाहिए।
श्री सरवटे : मैं आशा करता हूँ कि वह इस प्रकार की कोई स्वीकारोक्ति नहीं करेंगे।
* संसदीय वाद-विवाद, खंड XV भाग II, 22 सितंबर, 1951, पृष्ठ 3103