534 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
यह संसद इस बात की साक्षी है कि हिंदुओं ने उन विदेशियों को खदेड़ भगाया जिन्होंने हिंदुओं पर अस्थायी तौर पर प्रभुसत्ता कायम की। और हिंदू धर्म में ऐसा क्या कारण अथवा तत्व है जिसने ऐसा किया अथवा इसके उत्कर्ष में हिंदू धर्म की विशेषताएँ ही तो हैं। मेरे विचार में, ये विशेषताएँ इसकी प्रथाएँ ही हैं और प्रथाओं का अर्थ ऐसे रीति-रिवाज हैं जो धारा 3 में परिभाषित हैं और इस सदन ने उन्हें स्वीकृति प्रदान की है यथा-ऐसा नियम जो निश्चित है और सामान्य जन द्वारा विरोधी और अनुचित करार नहीं दिया गया है। यह कहा गया है कि रीति-रिवाज गलत प्रकृति का भी हो सकता है इसलिए इसका यहाँ उल्लेख करने की आवश्यकता है। परन्तु कहना है कि इसलिए यह उसके अनुसार प्रतिकूल हैः उसी प्रकार से विपरीत है जैसे आज बंध्यासुत है। यहाँ रीति-रिवाज को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि जिसका लोक-पद्धति विरोधी नहीं करती है वही रीति-रिवाज है। इसलिए ऐसे रिवाज जो लोक-पद्धति अथवा नैतिकता के विरोधी हैं, वे स्वयंमेव ही अप्रचलित हो जाते हैं। उन्हीं रीति-रिवाजों को बनाए रखना होगा जो उचित प्रतीत होते हैं।
सदन को यह ज्ञात होगा कि ‘हिंदू कानून’ के स्रोतों को इस प्रकार से निरूपित किया गया है यथा :
| Col1 | Col2 |
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| ;e | Re |
श्रुति स्मृतिः सदाचार स्वस्य च प्रियमात्मनः।
सर्वप्रथम श्रुति व स्मृति सामान्य मूलाधार पृष्ठभूमि तैयार करती हैं। तत्पश्चात् सदाचार व स्वस्य प्रियम विभिन्नता के लिए दिए गए हैं, जिसे कहते हैं देश के बहुत से क्षेत्रों के अनुकूल तत्व सिद्ध हों। यह ध्यान में रखना होगा कि भारत विस्तार रूप में एक महाद्वीप है और इसकी जनसंख्या, पूर्व में सोवियत रूस की जनसंख्या तथा पश्चिम के संयुक्त राज्य अमरीका दोनों की कुल जनसंख्या के लगभग है। इसलिए यहाँ जब तक कानून में विविधता है, कानून पूर्णरूपेण कठोर ही होगा और इसे विभिन्न क्षेत्रों की भिन्न-भिन्न आवश्यकतानुसार अनुकूल बनाना कठिन होगा।
अब मैं ‘हिंदू कानून’ के एक अन्य ग्रंथ का संदर्भ देना चाहूँगा-मेरा कहने का अर्थ है कि वह कानून अभी लागू है।
याज्ञवल्क्य कहते हैंः तथैव परिपात्यो सौ।।
अर्थात् देश में प्रचलित सभी रीति-रिवाज, चलन, पारिवारिक रस्में अक्षुण्ण रूप से सुरक्षित रखे जाएँगे। और इस संबंध में ‘व्यवस्था’ अथवा नियम है किः