535 येषां परम्परा प्राप्ता पूर्वजैप्यनुष्ठिता। त एव तैर्न पुष्येदुः आचारैर्न नै पुनः।।
जिनके पूर्वज इन रस्मों-रिवाजों को मानते थे, वे लोग निन्दा के योग्य नहीं हैं, अर्थात् रीति-रिवाज पुरातन हैं और स्मरणातीत समय से चले आ रहे हैं। और अन्य जो ऐसे प्राचीन नहीं हैं उनका अनुपालन नहीं किया जायेगा।
इसलिए इन व्यवस्था से, हिंदू धर्म ने अपना प्रसार करते हुए विभिन्न क्षेत्रों को अपना लिया।
अब, मैं कुछ लघु उदाहरणों को लेते हुए यह दिखाने का यत्न करूँगा कि यदि हम इस संशोधन को स्वीकारते हुए रीति-रिवाजों को पूर्ण रूप से समाप्त कर दें तो इसका क्या प्रभाव पड़ेगा। ऐसा संशोधन स्वीकार न किए जाने के बहुत से कारण हैं। सर्वप्रथम, मेरा विश्वास है, यहाँ तक कि विद्वान कानून मंत्री भी दक्षिण में कोप कोमरिन से लेकर उत्तर में हिमालय तक की सभी उचित रस्मों से परिचित नहीं हैं। न ही सभी रस्मों-रिवाजों से सदस्य परिचित हैं। और यदि वे परिचित हैं तो भी वे इस स्थिति में नहीं होंगे कि विद्वान डाक्टर अथवा अन्य सदस्यों को, उन रस्मों, व उनकी महत्ता व सार्थकता का विश्वास दिला पाएँ जो रस्में देश के भाग विशेष में प्रचालन में हैं। इसलिए, अपने संशोधन में, जो तकनीकी कारणों से स्वीकार नहीं किया गया अथवा प्रस्तावित नहीं किया गया, मैंने सामान्यतम् उपाय सुझाने का प्रयत्न किया है, जिससे क्षेत्रीय विधानमंडल इस कानून को लागू करने का अधिकारी होगा। इसलिए, मैं निवेदन करता हूँ कि देश में उचित रस्मों की अनभिज्ञता के कारण हमें यह नहीं कहना चाहिए कि ‘‘प्रावधान में दिए गए अनुसार बनाये रखें’’....। इस धारा को बचाने का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा और संशोधन का भाग (क) सभी उचित रीति-रिवाजों को समाप्त कर देगा चाहे वे असंगत हैं अथवा कानून के अनुसार नहीं हैं।
भाग (ख) के अनुसार केवल वही कानून जो वर्तमान कानून विरोधी हैं, अथवा भिन्न हैं, वे सभी रद्द कर दिए गए हैं। यह एक विशाल प्रावधान है, यदि इसे पूर्ण रूप से हटा दिया जाता है तो यह प्रावधान लुप्त हो जायेगा। धारा 3 में उल्लिखित सभी आवश्यक योग्यताओं द्वारा एक प्रथा शासित होती है, जिसे सदन पहले ही पारित कर चुका है और संविधान के अनुच्छेद 254 द्वारा कानूनन शासित किए जायेंगे।
मैं एक और दृष्टांत प्रस्तुत करूँगा। विवाह आखिरकार एक सामाजिक संस्था है, अर्थात् सामाजिक आवश्यकता की पूर्ति करता है। यदि देश के विभिन्न क्षेत्रों में सामाजिक परिस्थितियों की भिन्नता बहुतायत में हैं, तो कानून में बहुत से प्रावधान