536 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
बनाने होंगे जिसे अधिनियमित किया जाना हे। वर्तमान हिंदू कानून में इसे दो प्रकार से प्राप्त किया जा सकता है। प्रथम तो, यहाँ पर हिंदू कानून के विभिन्न संस्थान हैं। वहाँ ‘दायमाग’ और ‘मिताक्षरा’ का कानून है। याज्ञवल्कीय और मनु-स्मृति सामान्य पृष्ठभूमि हैं। दायमाग और ‘मिताक्षरा’ में भिन्न-भिन्न प्रकार दिए गए हैं। मिताक्षरा में आगे विभिन्न चार विभाग थे जो विभिन्न भागों को शासित करते। मिथिला विचार, बनारस विचार, मद्रास विचार और महाराष्ट्र विचार भी थे। हिंदू समाज में, भिन्नता लाने का यह एक तरीका था, मैं मानता हूँ कि इस कारण से यह कभी समाप्त नहीं होगा। द्वितीय, उस समय आचार होता था जिसके अनुसार हिंदू कानून और धर्म सभी की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु प्रगतिशील रहा जो इसमें प्राण-फूँकने वाला कारक था। यह भिन्नता ही थी, जिसने सामान्य पृष्ठभूमि में, शताब्दियों तक धर्म को जीवित रखने में योगदान दिया। विदेशी आक्रमणकारी आए और गए, परन्तु हिन्दुत्व अभी भी प्रगतिशील है।
मैं अब एक विवाह-प्रथा के प्रश्न पर आऊँगा। इसके बावजूद कि कानूनविदों ने क्या निश्चित किया है, समाज ने अपनी आवश्यकतानुसार विवाह की एक-विवाह-प्रथा अथवा अन्य प्रथाएँ अपनाईं। सही कानूनविदों का इसलिए इन विविध आवश्यकताओं हेतु कुछ कर्त्तव्य बनता है। विवाह-संस्था की रीति को शासित करने का एक अन्य कारक स्त्री-पुरुष का अनुपात रहा है। यदि स्त्री-पुरुष का अनुपात बराबर है तो एक विवाह-प्रथा होनी चाहिए और समाज को भी सुखी रहने के लिए बाध्य होना चाहिए। परन्तु यदि स्त्री-पुरुष के अनुपात में अंतर है तो समाज को तद्नुसार विवाह-प्रथा अपनानी होगी। यदि स्त्रियों की संख्या पुरुषों से अधिक हे तो द्विविवाह अथवा बहुविवाह प्रथा की अनुमति देनी होगी। अन्यथा इसका परिणाम या तो व्यभिचार या फिर अवैध संतानों की वृद्धि होगा।
श्री नजीरुद्दीन अहमद : इस विधेयक द्वारा व्यभिचार की अनुमति दी जा
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रही है।
श्री सरवटे : मैं इस बात पर ध्यान नहीं दूँगा। यह एक आम घटना थी जिस
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पर युद्ध के दौरान ध्यान दिया गया। जब संयुक्त राज्य में वयस्क पुरुष जनसंख्या युद्ध क्षेत्र में चली गई और देश में अपने पीछे अधिक संख्या में स्त्रियों को छोड़ गई जिसका परिणाम अवैध संतानों की भारी मात्रा में वृद्धि के रूप में प्राप्त हुआ जो अब समाधान के लिए एक कठिन प्रश्न बना हुआ है। यह घटना अन्य देशों में भी घटित हुई। इसलिए यदि पुरुषों की संख्या भी स्त्रियों से अधिक है तो किसी न किसी प्रकार से बहुपति-प्रथा चल पड़ेगी। उस मामले में भी वही समान परिणाम प्राप्त होगा। मैं एक विवाह-प्रथा के पक्ष में हूँ क्योंकि दोनों ही प्रकार से, एक तो यह