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प्रकृति का कानून है और समाज में लागू किया गया है तथा यह आधुनिक प्रवृत्ति के अनुसार है। उस संबंध में, सौभाग्यवश भारत में स्त्री-पुरुष का समान अनुपात है परन्तु फिर ऐसे कुछ अन्य विशेष कारण हैं जिन पर विचार किया जाना चाहिए। मेरे पास विभिन्न प्रांतों के अनुपात से संबंधित कुछ आँकड़े हैं। ये आँकड़े दर्शाते हैं कि मद्रास व बम्बई में दोनों का अनुपात बराबर है।
डॉ. अम्बेडकर : आप बहु-विवाह प्रथा की वकालत कर रहे हैं।
श्री सरवटे : मुझे बोलने दें। बंगाल और अन्य प्रांतों में पुरुषों की संख्या अधिक है और स्त्रियाँ कम हैं। इसलिए यदि आप उन सभी प्रांतों के लिए केवल एक ही प्रकार की विवाह-प्रथा को मान्यता देते हैं तो ऐसा नहीं होना चाहिए।
श्री ब्रजेश्वर प्रसाद (बिहार) : क्या मेरे माननीय मित्र ने विभिन्न आयु वर्गों-16
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से 35 वर्ष तक के पुरुष तथा 16 से 35 वर्ष तक की स्त्रियों की आयु के अनुपात का अध्ययन किया है? यह अध्ययन इस प्रश्न पर कि क्या एक-विवाहप्रथा अथवा बहु-विवाह प्रथा होनी चाहिए, इस पर प्रकाश डालेगा।
डॉ. अम्बेडकर : वे चाहते हैं कि आप स्त्री-पुरुषों की विभिन्न आयु वर्गों के अनुपात का अध्ययन करें। पर आप इस तर्क-वितर्क को नई पीढ़ी के लोगों के लिए क्यों नहीं छोड़ देते हैं?
श्री सरवटे : प्रत्येक व्यक्ति को अपना-अपना कार्य करना चाहिए। डॉ. अम्बेडकर को अपना कार्य करना चाहिए और मैं अपना कार्य कर रहा हूँ।
मेरी दलील के साथ आगे बढ़ने के लिए मेरी दलील की धारा को यह दिखाने के लिए मोड़ना कि विभिन्न आयु वर्गों में स्त्री-पुरुष का अनुपात कितना है, अयुक्तिपूर्ण और अनावश्यक है। यहाँ पर मैं यह प्रदर्शित करना चाहता हूँ कि भिन्न-भिन्न प्रदेशों में भिन्न परिस्थितियाँ रही हैं और उनका उसी प्रकार से प्रबंध किया जाना चाहिए जैसा प्रचलित हिंदू कानून में विभिन्न विद्यालयों एवं ‘आचार’ द्वारा किया गया था। यह एक ऐसा मुद्दा है जहाँ पर भिन्नता लाने की पूर्णतः आवश्यकता है और यह केवल उन रीति-रिवाजों को, जो अति प्राचीन हैं और लोक-नीति द्वारा शामिल हैं, चलन में रखने की अनुमति देने से ही हो सकता है।
मैं इस टिप्पणी के साथ समाप्त करता हूँ कि, यह संशोधन पूर्ण रूप से अनावश्यक है। उप-धारा (क) अवांछनीय है और उप-धारा (ख) अनावश्यक है। इसलिए, इस धारा को पूरे तौर पर हटा देना चाहिए और संशोधन की स्वीकृति नहीं देनी चाहिए।