538 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
* डॉ. सी. डी. पाण्डे (उत्तर प्रदेश) : मैं इस धारा को मिटाने के पक्ष में बोलने के
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लिए खड़ा हुआ हूँ जो रिवाजी कानून की वैधता को रद्द करती प्रतीत होती है। मेरा सोचना है कि यह धारा हिंदू संहिता के उद्देश्य का विस्तार करती है। मुझे संक्षेप में हिंदू संहिता विधेयक की उत्पत्ति के विषय में बोलने दें। इस विधेयक की क्या आवश्यकता है? यदि आप इसकी पृष्ठभूमि जानते हैं तो आपको यह भी ज्ञात होगा कि इस अधिनियम में इस धारा को बनाए रखना कितना असंगत है। हिंदू संहिता विधेयक की उत्पत्ति की लगातार माँग रही है, और हिंदू समाज के नेताओं के मन में एक भावना रही है कि एक ऐसा कानून अवश्य होना चाहिए जो मानव समाज के विकसित विचार के साथ अनुरूप बनाएं। केवल दो ही दशाएँ ऐसी हैं जिससे कि किसी भी मामले का पूर्ण रूप से निपटाया जा सके और हम उनके लिए तैयार हैंः प्रथम, एक-विवाह प्रथा की अनिवार्य रूप से तथा बिना अपवाद के स्वीकृति देनाः दूसरी बात है कि जो व्यक्ति, विशेष कठिनाइयों के मामलों में तलाक लेने के इच्छुक हैं, उन्हें तलाक मिल जाना चाहिए, उन्हें तलाक मिलने की प्रक्रिया उसके निराकरण में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। ये ही वे दो कारण हैं, जिनके लिए एक मुद्दा बनाया गया है और मुझे ऐसा नहीं दिखाई देता कि इस तरह का कोई मामला रिवाजी कानूनों की वैधता रद्द करने के लिए बनाया गया है। क्या आपने कभी ऐसा एक भी प्रतिवेदन या ऐसे लोगों की एक भी बैठक, जो रिवाजी कानूनों द्व ारा शासित किए जाते हैं, के बारे में सुना है जो कहे कि, इस कानून को बदल देना चाहिए, कि इसकी मनु के सख्त कानून के साथ अनुरूपता रखनी चाहिए? अथवा क्या आपने कभी सुना है कि वे अपने रिवाजी कानूनों से तंग आ गए हैं और वे मनु के कानून की परिधि में आना चाह रहे हैं? नहींः मैंने ऐसे एक भी प्रतिवेदन अथवा एक भी बैठक, या तो प्रेस अथवा मंच पर, यह माँग करती नहीं देखी है। कानून में, जहाँ तक कि एक-विवाह प्रथा अथवा तलाक का संबंध है, निरंतर सुधार लाने की माँग रही है। लोग कहते हैं कि विदेशों में हमारे नाम पर कलंक लगा है। ठीक है, ऐसा हो सकता है; इसलिए अब हमने एक-विवाह प्रथा और तलाक के सिद्ध ांत मान लिए हैं। लेकिन मैं यह नहीं पसंद करता हूँ कि हिंदू कानून में बदलाव लाने की छीना-झपटी में आप ऐसी नई बातें सम्मिलित कर दें जो इस भूमि में 80 प्रतिशत से अधिक लोगों के हित में पूर्णतया हानिकारक हों। यदि आप इस देश की जनसंख्या का विश्लेषण करें, तो कितने लोगों को आप मनु के कानून द्वारा शासित, पायेंगे? केवल मुट्ठीभर ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों को। पर फिर भी, वे स्थानीय कानूनों द्वारा भली-भांति शासित होते हैं और स्थानीय कानूनों ने हिंदू कानून पर
* संसदीय वाद-विवाद, खंड XV भाग II, 22 सितंबर, 1951, पृष्ठ 3107-12